बनारस को लेकर उन्होंने अपने मित्र मोहम्मद अली खान को लिखा कि यह इतना खूबसूरत शहर है कि अजनबी भी अपने दर्द भूल जाए ,अगर मुझे अपने दुश्मनों और धार्मिक कट्टरपंथियों का खतरा न होता तो मैं अपना धर्म छोड़ देता और मोतियों की माला पहने माथे पर चन्दन लगाए अपनी पूरी जिंदगी गंगा के किनारे बिता देता। बनारस में मिर्जा ग़ालिब तक़रीबन चार महीने रहे लेकिन उन्होंने बनारस शहर का चप्पा चप्पा छाना। बनारस यात्रा के 40 साल बाद गालिब ने अपने एक छात्र मियाँदाद खान को को लिखा कि बनारस एक अदभुत शहर है ,इस बात पर यकीं करना कठिन है कि ऐसा भी कोई शहर है, मेरा दुर्भाग्य है कि जब मेरी जिंदगी ख़त्म होने को थी तब मैं बनारस गया ,जब इस शहर में गंगा किनारे सूरज ढलता है तो यूँ लगता है जैसे नदी कोई नदी न होकर एक बड़ा सा जलता हुआ दिया हो ,और यहाँ की सुबह के क्या कहने वो बेमिसाल हैं। ग़ालिब ने बनारस पर 108 पंक्तियों की एक कविता लिखा थी जिसका नाम 'चिराग- ए - दयार' है इनमे से 69 पंक्तियों में वो केवल बनारस की खूबसूरती को बयां करते हैं।