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जवानी में आते तो बनारस के बेटे बन जाते ग़ालिब 

जवानी में आते तो बनारस के बेटे बन जाते ग़ालिब 

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Awesh Tiwary

Jul 01, 2017

ghalib, varanasi, benares

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पत्रिका एक्सलूसिव

आवेश तिवारी
वाराणसी। जून 1827 का वक्त था। हिंदुस्तान के मशहूर शायर असदुल्ला खां गालिब का घोड़ों पर सवार काफिला लखनऊ पहुंचा था ।उस वक्त गाजीउद्दीन हैदर अवध के बादशाह थे वो ऐशो आराम में रहते थे तो शासन का काम आगा मीर देखा करते थे। यूँ तो आगा मीर एक खानसामा थे लेकिन अंग्रेज रेजिडेंट और नवाब बेगम की इनायत कुछ ऐसी रही कि कुछ समय बाद शासन की सारी ताकत उनके हाथ में आ गई । खैर मिर्जा ग़ालिब के आने की खबर आगा मीर तक पहुंची। आगा ने कहलाया कि ग़ालिब से मिलने पर हमें ख़ुशी होगी लेकिन ग़ालिब महाअक्खड़। उन्होंने जवाब भिजवाया कि हम आपसे तभी मिलेंगे जब आप मेरे आने पर खड़े होकर गले मिले और मुझे नकद नजराना न देकर अशर्फियाँ दी जाएँ ।लेकिन आगा मीर इसके लिए तैयार न हुए नतीजा यह हुआ कि लगभग पांच महीने रहने के बाद मिर्जा ग़ालिब अपना लाव लश्कर लेकर 27 जून 1827 को कलकत्ता के लिए निकल लिए अभी वो रास्ते में थे कि गाजीउद्दीन हैदर का निधन हो गया उनकी जगह नसीरुद्दीन हैदर गद्दी पर बैठे मिर्जा ग़ालिब ने दिल्ली से लखनऊ की यात्रा के दौरान जो शेरो शायरी लिखी थी उस पर आठ साल बाद नसीरुद्दीन हैदर ने पांच हजार रुपयों के इनाम की घोषणा करी लेकिन वो रकम भी बीच वालों ने हड़प ली। खैर कलकता के रास्ते में पहले बांदा फिर इलाहाबाद और फिर बनारस पहुंचे। बनारस पहुँचते पहुँचते मिर्जा ग़ालिब की तबियत खराब हो चुकी थी ।

तआलिल्ला बनारस चश्मे बद्दूर
वो मानसून का वक्त था। बनारस के अस्सी घाट की सीढियों पर बैठे मिर्जा ग़ालिब को लगा जैसे वो स्वर्ग में पहुँच गए हैं। ग़ालिब ने कहा कि अगर मैं जवानी में यहाँ आता तो यही बस जाता उन्होंने लिखा 'तआलिल्ला बनारस चश्मे बद्दूर। बहिश्ते ख़ुर्रमो फ़िरदौस मामूर'। इसका मतलब है हे प्रभु! बनारस को बुरी नज़र से बचाना। यह नन्दित स्वर्ग है, यह भरा-पूरा स्वर्ग है ।बनारस में ग़ालिब ने यहाँ के औरंगाबाद मोहल्ले में जिसे उस वक्त नवरंगाबाद कहा जाता है एक बुजुर्ग महिला के साथ एक सराय में पनाह ली। वो महिला कौन थी उसका पता कभी न चल सका। उसके बाद मिर्जा ग़ालिब अपने एक प्रशंसक मिर्जा गुलाम अहमद के घर पर रहने चले गए। उन्होंने उस दौरान बनारस की खूबसूरती को देखकर कहा कि यह हिंदुस्तान का काबा है जिसका जिक्र इस शेर में है इबादत खानाए नाकुसियां अस्त,हमाना काबाए हिन्दुस्तानां अस्त।अपने मिजाज के अनोखे शहर बनारस के मोहपाश से मशहूर शायर मिर्जा असदुल्ला खां जिन्दगी भर दूर न रह सके। इस शहर की आबोहवा के बारे में गालिब ने अपने तीन मित्रों को लिखे पत्र में जिक्र किया।

ग़ालिब का काबा बनारस
बनारस को लेकर उन्होंने अपने मित्र मोहम्मद अली खान को लिखा कि यह इतना खूबसूरत शहर है कि अजनबी भी अपने दर्द भूल जाए ,अगर मुझे अपने दुश्मनों और धार्मिक कट्टरपंथियों का खतरा न होता तो मैं अपना धर्म छोड़ देता और मोतियों की माला पहने माथे पर चन्दन लगाए अपनी पूरी जिंदगी गंगा के किनारे बिता देता। बनारस में मिर्जा ग़ालिब तक़रीबन चार महीने रहे लेकिन उन्होंने बनारस शहर का चप्पा चप्पा छाना। बनारस यात्रा के 40 साल बाद गालिब ने अपने एक छात्र मियाँदाद खान को को लिखा कि बनारस एक अदभुत शहर है ,इस बात पर यकीं करना कठिन है कि ऐसा भी कोई शहर है, मेरा दुर्भाग्य है कि जब मेरी जिंदगी ख़त्म होने को थी तब मैं बनारस गया ,जब इस शहर में गंगा किनारे सूरज ढलता है तो यूँ लगता है जैसे नदी कोई नदी न होकर एक बड़ा सा जलता हुआ दिया हो ,और यहाँ की सुबह के क्या कहने वो बेमिसाल हैं। ग़ालिब ने बनारस पर 108 पंक्तियों की एक कविता लिखा थी जिसका नाम 'चिराग- ए - दयार' है इनमे से 69 पंक्तियों में वो केवल बनारस की खूबसूरती को बयां करते हैं।

बेआम बनारस को मीठा कर गए ग़ालिब
आम के बेहद शौक़ीन ग़ालिब जब बनारस में थे तब यहाँ के मशहूर लंगड़ा आम का मौसम ख़त्म हो चुका था। लेकिन बनारस को लेकर लिखी गई उनकी शायरी की मिठास ज्यों की त्यों बनी रही। बनारस के तत्कालीन राजा उदय नारायण सिंह ने उनके बारे में कहा था कि ग़ालिब ने कभी नकारात्मकता को बढ़ावा नहीं दिया वो मानते थे कि शहर हो या इंसान हर अँधेरे कोने में कहीं न कही कोई न कोई उजाला नजर आ ही जाता है ।

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