
यूपी में अपराधी बन रहे मासूम, मनौवैज्ञानिक ने बताए लक्षण
Psychologist Advice: यूपी के कानपुर में बीते दिनों एक 7 साल के मासूम ने 4 साल की मासूम बच्ची के साथ खेल-खेल में दुष्कर्म कर डाला। लहूलुहान हालत में घर पहुंची बच्ची ने मां-बाप को इसकी जानकारी दी तो उनके होश उड़ गए। घटना की जानकारी पर पुलिस के भी हाथ पांव फूल गए। पुलिस को ये समझ नहीं आ रहा था कि इस मामले में कार्रवाई क्या होगी? क्योंकि अपराधी और पीड़ित दोनों बहुत मासूम थे। बहरहाल इस मामले में पुलिस कानूनी सलाह ले रही है।
दूसरी घटना आगरा जिले की है। यहां ताजगंज क्षेत्र में साढ़े चार साल की मासूम से 13 साल के किशोर ने दुष्कर्म किया। घटना 4 दिन पहले उस समय की है, जब बच्ची घर पर अकेली थी। छात्र उसे बहाने से अपने घर बुलाकर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। रोते हुए अपने घर पहुंची बच्ची ने परिजनो को जानकारी दी। पहले तो परिवार वालों ने बदनामी के डर से मामले को दबा दिया, लेकिन बच्ची की दादी ने 4 दिन बाद थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। इस मामले में एसीपी सदर अर्चना सिंह का कहना है कि मुकदमा दर्ज कर विवेचना की जा रही है। इन दो घटनाओं के प्रकाश में आने के बाद पत्रिका उत्तर प्रदेश ने वाराणसी के वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. अजय तिवारी से बातचीत की। इसमें जो तथ्य निकलकर आए वे हैरान करने वाले हैं। आइए जानते हैं मनोवैज्ञानिक ने क्या कहा?
वाराणसी स्थित नई सुबह मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ मनोचिकित्सक एवं निदेशक डॉ. अजय तिवारी ने इन दोनों घटनाओं पर अफसोस जताते हुए बताया “कोरोना के समय से ही हमारी टीम निरंतर इस विषय पर काम कर रही है। इसमें कुछ तथ्य निकलकर सामने आए हैं। अगर मां-बाप अपने बच्चे के व्यवहार पर नजर रखें तो इस तरह की घटनाएं रोकी जा सकती हैं। बच्चा एक दिन में आपराधिक कदम नहीं उठाता है, उसे तैयारी करने में समय लगता है। इस दौरान उसके व्यवहार पर गौर किया जाए तो मां-बाप आसानी से उसे ट्रेस कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें खुद में भी बदलाव लाने होंगे। आजकल हम आर्टीफिशियल लाइफ जी रहे हैं। हम डिजिटल की दुनिया में खो गए और हमने अपने संस्कारिक भाव भूल गए हैं। हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है। पढ़ाई के नाम पर दिया गया मोबाइल उनकी मनोदशा पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। सीधे कहें तो मोबाइल बच्चों को अश्लीलता परोस रहा है।”
डॉ. तिवारी आगे बताते हैं “ आज की तारीख में बच्चे जल्दी मेच्योर हो रहे हैं। कक्षा पांचवीं का बच्चा दोस्ती के नाम पर गर्लफ्रेंड बनाता है और मां-बाप इसपर समय रहते ध्यान नहीं देते हैं। आजकल बच्चों में दोस्ती के मायने बदल गए हैं। ये मनोवैज्ञानिक बीमारी है। डिजिटल दुनिया में अनट्रेंड बच्चों के हाथ में मोबाइल देकर मां-बाप और शिक्षकों को सतर्क रहना होगा। इसके अलावा इसपर कोई नियंत्रण नहीं है। बच्चे जो मोबाइल में देखते हैं, अपने जीवन में उसका इंप्लीमेंट करते हैं। कम उम्र होने के चलते वे क्रिया और प्रतिक्रिया की गंभीरता नहीं जानते हैं।”
इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएं?
डॉ. तिवारी के अनुसार, इसे रोकने के लिए स्कूलों में मनोवैज्ञानिक तैनात होने चाहिए। ताकि समय रहते बच्चे का मनोवैज्ञानिक एसेसमेंट हो सके। इसके अलावा घर में माता-पिता भी बच्चों पर बराबर नजर रखें। उनका बच्चा क्या कर रहा है, क्या पढ़ रहा है, कैसा व्यवहार करता है। इसकी उन्हें पूरी जानकारी होनी चाहिए। आइए जानते हैं मनोवैज्ञानिक के बताए वे तथ्य, जो बच्चों को आपराधिक जगत में उतरने से बचा सकते हैं…
1. बच्चे की आशंकित गतिविधि का पता चलते ही मनोवैज्ञानिक एसेसमेंट कराना चाहिए।
2. हर माता पिता अपने बच्चे की रुचि पहचानें, जरूरी हो तो उसकी काउंसिलिंग कराएं।
3. बच्चों की ग्रोथ से लेकर उनके मानसिक विकास की जिम्मेदारी पूरी तरह उठानी होगी।
4. स्कूलों में टीचर, प्रिंसिपल के साथ प्रोफेशनल काउंसलर्स होना जरूरी है।
5. बच्चों के बिहेवियर पर अध्ययन जरूरी है। बच्चों को इंसर्ट और पीटना नहीं है।
6. बच्चों के क्राइम की मनोदशा समझने के लिए मां-बाप को पूरा समय देना चाहिए। उन्हें अपने बच्चे के व्यवहार, उसकी रुचि की जानकारी होनी चाहिए।
7. घर में बच्चों के सामने मां-बाप को संतुलित और उचित व्यवहार करना चाहिए। इससे बच्चों के दिमाग पर असर पड़ता है। आपसी प्रेम व्यवहार से बच्चे का संस्कारिक विकास होता है।
8. आखिरी और सबसे जरूरी बात ये है कि माता-पिता को ये देखना होगा कि अगर बच्चा एकांत में रहने का आदी हो रहा है। बात-बात में गुस्सा दिखा रहा है। अनुचित जिद कर रहा है। फीमेल के ज्यादा करीब जा रहा है तो उसकी पहचान कर तत्काल उसकी काउंसिलिंग करानी चाहिए। इससे भविष्य की कई परेशानियों से बचा जा सकता है।
Updated on:
23 Sept 2023 06:58 pm
Published on:
23 Sept 2023 06:24 pm
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