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जानिये क्या है शब-ए-बरात क्या है, क्याें मनाते हैं और क्या है इसका महत्व

इस्लामिक माह शाबान के महीने की 14 और 15 तारीख के बीच की रात को शब ए बराअत कहा जाता है

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Shab e Barat

प्रतीकात्मक फाेटाे

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

वाराणसी. रमजान शुरू होने में अभी कुछ दिन बचे हैं, लेकिन उसके पहले मुसलमानों के लिये एक ऐसी रात आती है जिसमें कहा जाता है कि सच्चे दिल से इबादत कर दुआ मांगने पर गुनाह माफ हो जाते हैं। उस रात को शब-ए-बराअत कहते हैं। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि इबादत और दुआ की रात है। पर कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके गुनाह इस रात को भी माफ नहीं होते। बनारस की उस्मानिया मस्जिद के ईमाम मुफ्ती हारून रशीद नक्शबंदी ने कहा कि शब ए बराअत पर रात में बेवजह बाइक पर निकलकर घूमना हुल्लड़बाजी करना बाइक स्टंट करना ये सब न सिर्फ गलत है बल्कि गुनाह जैसा है। ये रात इबादत और गुनाहों की माफी का मौका है, इसे गंवाने वाला बदकिस्मत होता है। शब ए बराअत के बारे में उन्होंने पत्रिका से विस्तार से बात की।


शब-ए-बराअत का मतलब

इस्लामकि महीने शाबान के 14 और 15 तारीख के बीच की रात को 'शब ए बराअत' कहा गया है। इस रात के बारे में पैगम्बर साहब ने फरमाया है कि आज की रात अल्लाह की जानिब से लोगों की माफी की जाती है। इस रात को अरबी में लैलतुल बराअत कहा जाता है। 'लैला' का अर्थ अरबी में रात और 'बराअत' का अर्थ है छुटकारा। इस रात इबादत कर गुनाहों की माफी मांगी जाती है। यानि ये गुनाहों से छुटकारे की रात है। फारसी जबान में रात को शब कहते हैं और उर्दू में भी शब ही कहते हैं। इसलिये जहां उर्दू हिन्दी और फारसी बोली जाती है वहां इसे शब-ए-बराअत कहा जाता है। शब-ए-बरात इसका बिगड़ा शब्द है।

मुफ्ती हारून रशीद नक्शबंदी IMAGE CREDIT:

इस रात किसकी नहीं होती माफी

'शब ए बराअत' की रात यूं तो गुनाहों की माफी की रात है और कहा जाता है कि इस रात को मांगी गई दुआ असर रखती है। पर मुफ्ती हारून रशीद बताते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी माफी इस मुबारक रात को भी नहीं होती। जो मां-बाप की नाफरमानी करे, दूसरों के साथ छल कपट करता हो, दिल का साफ न हो, जादूगरी करे, शिर्क करे। ऐसे लोगों की माफी नहीं है।


इस दिन की इबादत का पूण्य

उन्होंने बताया कि 'शब ए बराअत' की रात इबादत कर गुनाहों की माफी दुआ मांगी जाती है। इस्लाम में ऐसी मान्यता है कि इस रात को ऐस करने से गुनाह माफ हो जाते हैं। रात के पिछले हिस्से में की गई दुआ कबूल होती है, ऐसा कहा जाता है। यानि रात दो बजे से लेकर भोर में चार बजे तक। उन्होंने बताया कि इसके अगले दो दिन रोजा रखा जाता है।


पटाखा बजाना

शब ए बराअत और पटाखा छाेड़ने का आपस में कोई लेना देना नहीं। यह बिल्कुल फिजूल खर्ची और वक्त की बरबादी है। मुफ्ती हारून ने बताया कि इसका इस्लाम से या शब ए बरात से ताल्लुक नहीं है।


मस्जिद मजारों पर रोशनी

मुफ्ती हारून के मुताबिक रोशनी करना एक रवायत (परंपरा) है। मजारों पर रोशनी करने का मकसद वहां मजारात की निशानदेही और लोगों के लिये सहूलियत जैसा है। कब्रिस्तानों में आने जाने वालों की सहूलियत के लिये रोशनी कर दी जाती है। मस्जिदों के रास्ते व मस्जिदों को भी रोशन कर दिया जाता है ताकि अंधेरे से दिक्कत न हो।


पकवान

इसका पकवान से कोई ताल्लुक नहीं है। एक रवायत है मीठा पका लेने की। लोग फातिहा के लिहाज से भी ऐसा करते हैं।

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