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Haritalika Teej Vart- अखंड सौभाग्य की कामना से महिलाओं ने रखा हरितालिका तीज व्रत, मंगला गौरी से मांगा सौभाग्य का आशीर्वाद

- सुहागिनें पति के दीर्धायु के लिए रखती हैं Haritalika Teej Vart-द्वितीया रहित भाद्र पद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है यह व्रत-तृतीया तिथि को 24 घंटे निराजल व्रत रखने की है मान्यता-काशी में मंगला गौरी का किया गया दर्शन-पूजन

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माता मंगला गौरी

माता मंगला गौरी

वाराणसी. पति के दीर्घायु (अखंड सौभाग्य) की कामना से महिलाओं ने सोमवार को हरितालिका तीज का निराजल वर्त रखा। वो 24 घंटे बाद ही व्रत का पारण करेंगी। इस दौरान वो शाम ढलने से पूर्व भगवान शंकर, माता पार्वती और मां की गोद में बैठे भगवान श्री गणेश की मृणमयी प्रतिमा (कच्ची मिट्टी की बनी मूर्ति) की पूजा करेंगी। काशी में व्रती महिलाएं मंगला गौरी का दर्शऩ-पूजन कर सौभाग्य का आशीर्वाद मांगने की मान्यता है। ऐसे में सुहागिन महिलाओं ने सभी शृंगार कर मंदिर जा कर मां का पूजन किया और आशीर्वाद ग्रहण किया।

इस बार हरितालिका तीज सोमवार को पड़ने से इसका महत्व और भी बढ गया है। कारण इस व्रत पर्व में भोले शंकर और माता पार्वती की पूजा की जाती है और सोमवार को तो वैसे भी भोले शंकर का ही दिन माना जाता है। ऐसे में काशी में मंगला गौरी को माता पार्वती के स्वरूप की मान्यता है। माना जाता है कि माता मंगला गौरी का दर्शन-पूजन करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ऐसे में सोमवार को हरितालिका तीज के मौके पर सुबह से ही मां का आशीर्वाद ग्रहण करने के लिए सुहागिनों की कतार लग गई थी। आलम यह था कि इस भीषण उमस भरी गर्मी में खर उपवास रख सुहागिनें लगभग दो किलोमीटर लंबी कतार में लगी रहीं और माता का दर्शन कर आशीर्वाद ग्रहण किया।

हरतालिका तीज व्रत के बारे में पुराणों में लिखित है कि देवी पार्वती ने भगवान शंकर को वर रूप (पति) में हासिल करने के लिए यह व्रत किया था। हरितालिका तीज व्रत कथा के बारे में बताया गया है कि जब माता पार्वती को यह पता चला कि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु के साथ करवाना चाह रहे हैं तो वह व्यथित हो गईं। इसके बाद उनकी सहेलियों ने उनका हरण कर लिया और काफी खोजबीन के बाद जब वह अपने पिता को मिलीं तब उन्होंने अपना विवाह शिव के साथ करने को कहा, क्योंकि जब उनकी सहेलियों ने उनका हरण किया, उस दौरान वह एक गुफा में भगवान शिव की आराधना में ही लीन थीं। इस वजह से इस पर्व को हरतालिका तीज के नाम से जाना जाता है।

हरितालिका तीज व्रत कथा

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शिव जी ने माता पार्वती को इस व्रत के बारे में विस्तार पूर्वक समझाया था। मां गौरा ने माता पार्वती के रूप में हिमालय के घर में जन्म लिया था। बचपन से ही माता पार्वती भगवान शिव को वर के रूप में पाना चाहती थीं और उसके लिए उन्होंने कठोर तप किया। 12 सालों तक निराहार रह करके तप किया। एक दिन देव ऋषि नारद माता पार्वती के पिता हिमालय के पास पहुंचे और कहा कि पार्वती के कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं। नारद मुनि की बात सुनकर महाराज हिमालय बहुत प्रसन्न हुए। उधर, भगवान विष्णु के सामने जाकर नारद मुनि बोले कि महाराज हिमालय अपनी पुत्री पार्वती से आपका विवाह करवाना चाहते हैं। भगवान विष्णु ने भी इसकी अनुमति दे दी।

फिर माता पार्वती के पास जाकर नारद जी ने सूचना दी कि आपके पिता ने आपका विवाह भगवान विष्णु से तय कर दिया है। यह सुनकर पार्वती बहुत निराश हुईं उन्होंने अपनी सखियों से अनुरोध कर उन्हें किसी एकांत गुप्त स्थान पर ले जाने को कहा। माता पार्वती की इच्छानुसार उनके पिता महाराज हिमालय की नजरों से बचाकर सखियां माता पार्वती को घने सुनसान जंगल स्थित एक गुफा में छोड़ आईं। यहीं रहकर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया जिसके लिए उन्होंने रेत के शिवलिंग की स्थापना की। संयोग से हस्त नक्षत्र में भाद्रपद शुक्ल तृतीया का वह दिन था जब माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की। इस दिन निर्जला उपवास रखते हुए उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया।

उनके कठोर तप से भगवान शिव प्रसन्न हुए माता पार्वती जी को उनकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया। अगले दिन अपनी सखी के साथ माता पार्वती ने व्रत का पारण किया और समस्त पूजा सामग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। उधर, माता पार्वती के पिता भगवान विष्णु को अपनी बेटी से विवाह करने का वचन दिए जाने के बाद पुत्री के घर छोड़ देने से व्याकुल थे। फिर वह पार्वती को ढूंढते हुए उस स्थान तक जा पंहुचे। इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें अपने घर छोड़ देने का कारण बताया और भगवान शिव से विवाह करने के अपने संकल्प और शिव द्वारा मिले वरदान के बारे में बताया, तब पिता महाराज हिमालय भगवान विष्णु से क्षमा मांगते हुए भगवान शिव से अपनी पुत्री के विवाह को राजी हुए।

ऐसे में व्रती महिलाओं ने दिन भर व्रत रखने के पश्चात शाम को पूजन गृह को स्वच्छ कर पूजा वेदी बनाई, केले के पत्ते से मंडप सजाया गया फिर बीच में भगवान शंकर माता पार्वती और गणेश की मृणमयी प्रतिमा रखा, सोलहो शृंगार की वस्तुएं रखीं फिर समूह में इस हरितालिका तीज व्रत कथा को सुना। विधि विधान से पूजा कीष