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काशी में स्थापित है विश्व का यह अनोखा मंदिर

कभी यहां राष्ट्रनेता भी झुकाते थे सर, आज अपने अस्तित्व को कराह रही ये मां

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Sarweshwari Mishra

Sep 26, 2016

Bharat mata mandir

Bharat mata mandir

वाराणसी. 'मां' यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम−रोम पुलकित हो उठता है। हृदय में भावनाओं का अपार प्यार उमड़ पड़ता है और मनो मस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। 'मां' वो मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। 'मां' की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।



ऐसी ही एक मां जो सारे संसार को अपने आंचल में न जाने कितने वर्षों से संजोए हुए हैं। वो हैं हमारी भारत मां। लेकिन सच तो यह है कि आज हमारी आने वाली पीढ़ी इन्हें भूलती जा रही है। उत्तर प्रदेश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के राजघाट पर स्थित अपने ढंग का अनोखा एकमात्र भारतमाता मंदिर अपनी उपेक्षा का दर्द झेल रहा है।

Bharat Mata Temple

इस मंदिर की आराध्य भारत माता हैं। यहां पर पूजा, कर्मकाण्ड या दूसरे मंदिरों जैसे घंटा घड़ियाल नहीं बजते और न ही पंडितों पुरोहितों की खींचतान होती है। आजादी की लड़ाई के दौर में अपने प्राणों की आहुति देने वालों का प्रेरणा स्रोत यह मंदिर आज भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं ईसाई जैसे जाति या साम्प्रदायिक और उन्मादी धार्मिक भावना से कोसों दूर सर्वधर्म समभाव का संदेश दे रहा है।



सभी जाति-धर्म के लिए बना है यह मंदिर
मंदिर का उद्घाटन 25 अक्टूबर 1931 को महात्मा गांधी ने किया था। मंदिर के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा था कि इस मंदिर में किसी देवता या देवी की मूर्ति नहीं है, यहां संगमरमर पर उभरा हुआ भारत का एक मानचित्र भर है। मुझे आशा है कि यह सभी धर्मों, सभी जातियों के लोगों के लिए एक सार्वदेशिक मंच का रूप ग्रहण करेगा और देश में पारस्परिक धार्मिक एकता, शान्ति और प्रेम की भावनाओं को बढ़ाने में बड़ा योग देगा।



राष्ट्रीय भावना की प्रेरणा के केन्द्र के रूप में वाराणसी शहर के मध्य सिगरा क्षेत्र में महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू शिव प्रसाद गुप्त के ऐतिहासिक अवदान की इस राष्ट्रीय धरोहर को जिला प्रशासन समेत अन्य लोग भूलते जा रहे हैं। इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।



अपने अस्तित्व के लिए कराह रहा यह तीर्थ स्थल
महात्मा गांधी ने इसे एक तीर्थ माना लेकिन यह तीर्थ आज अपने अस्तित्व के लिए कराह रहा है। रख रखाव की कोई व्यवस्था न होने से मंदिर की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।



अपनी स्थापना का रजत एंव स्वर्ण जयन्ती मना चुका भारत माता मंदिर की जयन्ती मनाने में न सरकार की रुचि है और न ही यहां की जनता को कोई चिंता। शहर की दर्जनों सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं सैकड़ों तरह का प्रति वर्ष आयोजन करती हैं लेकिन अपनी भारत माता की खोज खबर लेने वाला कोई नहीं है।

Bahrat mata mandir

कभी राष्ट्रनेता भी यहां झुकाते थे सर
कभी तमाम बड़े क्रान्तिकारियों एवं राष्ट्रनेताओं के मस्तक यहां झुकते थे लेकिन अब तो कोई उधर देखता तक नहीं। मंदिर के संस्थापक राष्ट्र रत्न बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने कहा था, वैसे तो हर भारतवासी का हृदय भारत माता का मंदिर है परन्तु यह एक प्रेरक मंदिर है जो आने वाली पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देगा।


मंदिर की बडी खासियत यह है कि इसके निर्माण में लगे एक एक शिल्पी व कारीगर का नाम जहां अंकित है वहां मंदिर के संस्थापक बाबू शिव प्रसाद गुप्ता का नाम कहीं नहीं है। मंदिर में भारत माता का संगमरमर से बना अत्यन्त सुन्दर नक्स ही आराध्य है जिसके दर्शन होते हैं। मंदिर की दीवारों पर अनमोल पेंटिंग धुंधली हो गई है।



शिवप्रसाद गुप्त ने की थी इस मंदिर की स्थापना
काशी विद्या पीठ एवं देश के सबसे पुराने हिन्दी अखबार ‘आज’ के संस्थापक शिव प्रसाद गुप्त को इस मंदिर को बनवाने की प्रेरणा मुम्बई से पुणे जाते समय हुई थी। वह वहां विधवाश्रम देखने गए। आश्रम में जमीन पर भारत माता का एक मानचित्र बना था। उन्हें यह मंदिर अच्छा लगा।



वाराणसी लौटने के बाद भारत मंदिर बनाने की योजना अपने गुरजनों एवं सहयोगियों से मिलकर बना डाली। भारत माता मंदिर का शिलान्यास समाजवादी भगवान दास ने दो अप्रैल 1926 को किया था।



महात्मा गांधी के कथन
'काशी विद्यापीठ', वर्तमान में 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' के परिसर में दुनिया के इस अनोखे मंदिर का निर्माण हुआ है। इसका उद्घाटन करने के बाद महात्मा गांधी ने अपने सम्बोधन में कहा था कि- "इस मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। मुझे आशा है कि यह मंदिर सभी धर्मों,सभी जातियों के लोगों के लिये एक सार्वदेशिक मंच का रूप ग्रहण कर लेगा और इस देश में पारस्परिक धार्मिक एकता, शांति तथा प्रेम की भावना को बढ़ाने में योगदान देगा।


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यहीं से दिख जाता है हिमालय पर्वत और चोटियां
इस भूमि की पूर्व से पश्चिम तक लम्बाई 32 फुट दो इंच और उत्तर से दक्षिण तक 30 फुट दो इंच है। इसमें 762 चौकोर एक इंच वर्ग के मकराना के श्वेत पत्थर काटकर लगे हैं। इसमें हिमालय पर्वत की चोटियां एवं समुद्र दिखाया गया है। भारत भूमि के उत्तर में तिब्बत, तुर्किस्तान, पूर्व में ब्रह्मा मलम एवं चीन की दीवार का थोड़ा अंश दिखाया गया है। दक्षिण में बंगाल की खाड़ी एवं अन्य दिखाया गया है।




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भारत भूमि की समुद्र तल से उंचाई और गहराई आदि के मद्देनज़र संगमरमर बहुत ही सावधानी से तराशे गये हैं। मानचित्र को मापने के लिये धरातल का मान एक इंच बराबर 6.4 मील जबकि ऊंचाई एक इंच में दो हज़ार फ़ीट दिखायी गयी है। एवरेस्ट की ऊंचाई दिखाने के लिये पौने 15 इंच ऊंचा संगमरमर का एक टुकड़ा लगाया गया है। मानचित्र में हिमालय समेत 450 चोटियां, 800 छोटी व बड़ी नदियां उकेरी गयी हैं। बडे़ शहर सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी भौगोलिक स्थिति के मुताबिक दर्शाये गये हैं। बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने इस मानचित्र को ही जननी जन्मभूमि के रूप में प्रतिष्ठा दी। मंदिर की दीवार पर बंकिमचंद्र चटर्जी की कविता 'वन्दे मातरम' और उद्घाटन के समय सभा स्थल पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी गयी कविता ‘भारत माता का यह मंदिर’ समता का संवाद है।

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