
अहमदाबाद. माहेश्वरी सखी संगठन की स्थानीय इकाई की ओर से कांकरिया क्षेत्र स्थित वेद मंदिर में आयोजित नानी बाई रो मायरो कथा के तीसरे दिन गुरुवार को कथा का समापन होगा। कथा के दूसरे दिन बुधवार को कथाकार गौवत्स राधाकृष्ण ने नानी बाई के ससुराल में पिता नरसी मेहता की ओर से मायरा लेकर पहुंचने तक के प्रसंग सुनाए।
उन्होंने कहा कि पिता-पुत्री का संबंध अलौकिक होता है। दुनिया में लोग बाप-बेटा गाते रहते हैं लेकिन, असली संबंध तो बाप-बेटी का होता है। बेटे तो बड़े होकर कमाने के लिए अन्य शहर में जाते हैं। बेटी ही ससुराल जाने से पहले मांं-बाप का ख्याल रखती है। जो जगह पिता के दिल में बेटी की होती है, वह किसी दूसरे की नहीं हो सकती। बेटी की विदाई में पिता की आंखों से निकलने वाले आंसू देखकर ही पता चलता है कि बेटी से पिता कितना प्रेम करता है। कुछ लोग तो बेटी की विदाई के समय पिता को रोते देखकर ही रो देते हैं। फिल्मों में बेटियों को स्वार्थी दिखाया जाने लगा है लेकिन एक पिता प्रेम, लगाव के कारण अपनी बेटी की चिंता करते हैं।
बेटा नहीं तो भगवान से कम से कम एक बेटी देने की प्रार्थना करें
उन्होंने कहा कि घर में बेटे को सारी संपत्ति देने के बावजूद बेटी की भांति मां-बाप की चिंता एक बेटा नहीं कर सकता। बेटा तो सुबह घर से निकलने और रात को घर लौटने पर मां-बाप के हाल पूछते हैं, बेटियां तो ससुराल में दूर रहकर भी चिंता के कारण दिनभर में कई बार फोन पर मां-बाप के हाल पूछती हैं। इसलिए घर में बेटी होना सौभाग्य की बात होती है, लोगों को बेटा नहीं तो कम से कम एक बेटी देने की प्रार्थना भगवान से अवश्य करनी चाहिए।
परिवार में बेटियों वालों से जलते हैं लोग
जिस परिवार में बेटी है और बेटा नहीं है, वे बिल्कुल न सोचें कि बेटा नहीं है। जिन परिवारों में बेटियां होती हैं, उनसे लोग जलते हैं। कोई भी कंपनी जो उत्पाद बनाती है, वह उत्पाद जहां जाता है वहां उसका उपयोग करने के बाद उसे बनाने वाले की तारीफ जाती है। उसी प्रकार बेटा तो घर में ही रहता है लेकिन बेटी अपने ससुराल जाकर अपने व्यवहार व गुणों के कारण पीहर वालों की तारीफ करवाती हैं।
बेटी के पाणिग्रहण व विदाई के बाद माता-पिता अपने जीव को कठोर कर लेते। बेटियां भी अपना सब-कुछ पति को समझने लगती। जब तक कोई ठोस कारण, विशेष प्रसंग न हो तो ससुराल से बेटियां पीहर नहीं जाती। ससुराल वाले 2-3 दिन से अधिक दिन तक बहू को उसके पीहर में नहीं रहने देते। कहीं-कहीं तो संबंध अच्छे होने पर ससुराल वाले स्वयं ही बहू को पीहर भेजते।
दिल से दिया जाने वाला दहेज नहीं, होता है वरदान
उन्होंने कहा कि नानी बाई भी गांव के बाहर ठहरे पिता का स्वागत करने के लिए दो महिलाओं के साथ पहुंची। पिता ने नानीबाई के सिर पर हाथ रखा तो वह बहुत प्रसन्न हुई। बेटी के विवाह के लिए पिता कहीं से भी व्यवस्था करके सोना, कपड़े, सामान देते हैं। दहेज देना-लेना तो दिखावा होता है, दिल से पिता जो कुछ-भी बेटी को देता है दहेज नहीं बल्कि वह वरदान होता है।
राजा जनक की ओर से 6 बार दहेज देने पर भी राजा दशरथ की ओर से स्वीकार नहीं करने का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि राजा दशरथ ने राजा जनक को कहा था कि आपने तिजोरी से जो धन निकाल कर दिया उसे संभालूं या आपने कलेजे रूपी टुकड़ा दिया उसे संभालूं। राजा दशरथ ने कहा था कि जानकी और उसकी बहनों के साथ आए धन के बजाए अयोध्या में जानकी के गुणों की प्रशंसा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी के घर नई बहू आने पर उसके गुणों की चर्चा कोई भी नहीं करता बल्कि दहेज में लाए गए सामान देखने और उसकी चर्चा करते हैं। हर पिता अपना सब-कुछ लगाकर बेटी के लिए अच्छी से अच्छी व्यवस्था करता है। घर में दी गई चीज को घर में रह जाती है लेकिन, दहेज में दी जाने वाली चीजें बेटी अपने साथ ससुराल ले जाती हैं। संगठन की अध्यक्ष अनुराधा अजमेरा ने प्रारंभ में सभी का स्वागत किया। सचिव निक्की राठी ने आभार व्यक्त किया।