बांसवाड़ा. बांसवाड़ा में बांस की आधिक्यता है और अमरथून ग्राम पंचायत के भौमपाड़ा गांव के आदिवासी परिवारों ने बांस को आजीविका का आधार और बांस से निर्मित वस्तुओं की पहचान बनाकर जिले के नामकरण की सार्थकता भी सिद्ध की है। युवाओं की ओर से अपने परम्परागत रोजगार को अपनाने से यहां आत्मनिर्भरता बढ़ी है और बेरोजगारी का दंश भी मिटा है। अब इन लोगों को मुख्य धारा में आने के लिए सरकार से संबल की दरकार है।
नित बदलते परिवेश में परंपरागत रोजगार को नई बुलंदियों तक पहुंचाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ रहा है। मार्ग में आने वाली बाधाओं को संघर्ष के साथ पार किया जा रहा है। इसी सिद्धांत को भौमपाड़ा के आदिवासी परिवारों ने अपनाया है, जो वर्षों से कृषि के साथ परंपरागत रोजगार को अपनाकर अपनी पहचान जीवित रखे हुए हैं।
कृषि के साथ परंपरा का संगम
भौमपाड़ा के 79 वर्षीय गणेशलाल सारेल ने बताया कि आज गांव में करीब 1800 की आबादी है। 90 प्रतिशत घरों में कृषि कार्यों के साथ बांस से निर्मित वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है, जिसकी वर्तमान में बड़ी मांग है। बुजुर्गों के साथ युवा भी इसे अपना रहे हैं, जिससे गांव में युवा बेरोजगार नहीं हैं। देवचंद निनामा ने बताया कि गांव में जैविक खेती के साथ-साथ में परंपरागत हस्तनिर्मित बांस की वस्तुओं के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैविक खेती के लिए हर घर में गड्डे खोद रखे हैं, जहां खाद एकत्रित कर कृषि कार्य में उपयोग किया जाता है।
मदद की आवश्यकता
पुनिया सारेल एवं गोदी देवी ने बताया कि इस व्यवसाय में मेहनत के साथ कौशल होना जरूरी है। वर्षों से गांव में बांस से निर्मित वस्तुओं का निर्माण चल रहा है। इन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार से मदद की दरकार है। इस पर वाग्धारा संस्था के कमलेश बुनकर और विकास मेश्राम ने हुनर कलाकारों के लिए देय ऋण की विश्वकर्मा योजना की जानकारी दी।
बांस से इन वस्तुओं का निर्माण
भौमपाड़ा के ग्रामीण धान रखने की कोठी, पशुओं को चारा देने के लिए टोपला, डाला, रोटी रखने के लिए सागरी, कचरा साफ करने के लिए बोगरा, धूप से बचाव के लिए कड़े, उड़िया आदि का निर्माण कर रहे हैं, जो उन्हें आत्म निर्भरता की ओर ले जा रहे हैं।