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भीलवाड़ा

गीत गाते हुए बैलों को चरखी में हांकने वाले पल अब कहां

अब चरखी चप्पा चप्पा नहींं चल कर यदा कदा चन्द जगहों पर ही

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बरून्दनी।
एक जमाना था जब गांंवों में चप्पा चप्पा चरखा चरखी चलती थी लेकिन बदलते परिवेश और बदलती तकनीक का असर चरखी पर भी पड़ा। अब चरखी चप्पा चप्पा नहींं चल कर यदा कदा चन्द जगहों पर ही चलती है।



बीते जमाने में गांवों के जल स्रोतों में प्रचुर मात्रा में पानी था और गन्ने की खेती बहुतायत से होती थी । गन्ने की पिराई के लिए गांवों में कई स्थानों पर चारखियां स्थापित होती थी। जिन्हें बैल खींचते और गन्ने से रस व गुड़ निर्मित होता। चरखी पर जो भी आता कृषक उसे शिवजी का प्रसाद समझते थे।


समय बदला, नवीन तकनीक आई ,पानी की कमी हुई फिर क्या गन्ने की ऊपज प्रभावित होने लगी। किसानों का गन्ने की खेती के प्रति रुझान कम हुआ। बैलों के माध्यम से खींचने वाली चरखियां कम हुई। उनकी जगह आई डीजल इंजन और विद्युत मोटर से संचालित होने वाली चारखियां । इन चरखियों पर गन्ने की पिराई और देशी गुड़ का निर्माण भी बड़े पैमाने पर होने लगा। गाँवों में किसान के लिए देशी गुड़ प्रमुख खाद्य सामग्री माना जाता रहा है।


चित्तौड़गढ़ जिले के बलदरखा गांव के किसान शंकर लाल जाट ने अपने खेत पर ऐसे ही एक छोटा सा काम तीन वर्ष से शुरू किया। पांच से छह श्रमिक ,एक मिस्त्री डीजल इंजन व अन्य उपकरण । बड़ी चरखी जिस पर प्रतिदिन 5 से 6 क्विंटल देशी गुड़ बन जाता है। तीन माह तक सीजन रहता है ।


यह तो हुए वर्तमान हालात लेकिन जब आज से बीस तीस बरस पहले की स्मृति वह याद करते तो उन्हें बीते जमाने की सुगन्ध अब भी महसूस होती है। उस जमाने में होता था अपनत्व, एक दूजे के सहयोग के लिए बढ़ते हाथ । गीत गाते हुए बैलों को चरखी में हांकने वाले पल अब नहीं है। काश चप्पा चप्पा चरखी फिर से चले।