क्षेत्र के गांवो में कई किसानों ने खेतो में अमरूदों के बगीचे लगाए, लेकिन किसानों को अमरुदो की खेती में न उत्पादन ओर न ही फायदा मिल रहा है, जिससे किसान अब वापस परंपरागत खेती की ओर लौट रहे है। सहण पंचायत के किसान नरेश शर्मा ने बताया कि उन्होंने 3-4 साल पहले करीब 4 बीघा कृषि भूमि पर परंपरागत खेती छोडक़र अमरूद के करीब 430 पौधे लगाए थे। 3-4 साल से अमरूद के पौधो की सारसंभाल भी कर रहे है, लेकिन फिर भी किसानों को फायदा हाथ नहीं लग रहा है। अब किसान अमरूद के पौधों को हटाकर परंपरागत खेती की ओर लौट रहे है।
खर्चा भी नहीं निकल रहा
किसानों को पौधों की सारसंभाल का खर्चा भी नहीं निकल रहा है। शर्मा ने बताया कि कभी बरसता की अधिकता, कभी बरसात की कमी, मौसम की मार, लट प्रकोप आदि के चलते पौधों में आवश्यकतानुसार फलाव नहीं होने से किसानों को फायदा नहीं मिल रहा है। 4 बीघा में अमरूद के पौधे लगाकर 4 सालों से सारसंभाल कर रहे है, लेकिन जब उत्पादन तथा फायदा मिलने का समय आया तो केवल निराशा हाथ लग रही है।
इधर कृषि पर्यवेक्षक भरत ने बताया कि उच्चतम गुणवत्ता का बीज नहीं होने से ऐसे पौधो में फलाव की कमी है। इसलिए किसानों को उत्पादन व फायदा मिलने में परेशानी हो रही है।