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पांच सौ साल से गांव में केवल एक ही जाति के लोगों का निवास
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पांच सौ साल से गांव में केवल एक ही जाति के लोगों का निवास

चंदेल राज्य की सीमा पर बनाया गया था गोडवाना राज्य का किला

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दिलीप अग्रवाल
छतरपुर/बड़ामलहरा. जनपद मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत महाराजगंज का ग्राम खटोला एक ऐसा गांव है जहां कुशवाहा जाति के अलावा अन्य किसी भी जाति के लोग निवास नहीं करते। यह एक ऐतिहासिक गांव है जहां 15वीं-16वीं सदी के इतिहास में मिलने वाले खटोला राज्य के कई स्मारक बने हैं, जो वर्तमान में उपेक्षा का शिकार हैं। कई लोगों का ऐसा मानना है कि इन स्मारकों में दफीना है इसलिए लोग यहां खुदाई करते हुए इन स्मारकों को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं।

जगह-जगह खुदाई के निशान
रात्रि के अंधेरे में दफीना पाने के लिए लालची लोग इन स्मारकों में जगह-जगह खुदाई करते हैं। यहां मौजूद गड्ढे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यहां दफीना पाने के लिए लोग सक्रिय हैं। गांव में स्थित खटोला देवी, चौरासन देवी और फूटा मामा की पूजा करने के लिए आज भी बड़ी संख्या में गौंड़ वंशज मंडला, जबलपुर, वरमान आदि क्षेत्रों से यहां आते हैं। देख-रेख के अभाव में यहां निर्मित बावड़ी और कुंए भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं लेकिन यहां का तालाब आज भी जीवित है। इतिहासकारों का मानना है कि खटोला राज्य में 84 बावड़ी, 52 कुंए और 7 तालाब हुआ करते थे लेकिन वर्तमान में सभी कुंए और बावड़ी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं जबकि 7 तालाबों में से नयाताल, गढ़ीताल, कनकुवा ताल और खटोला ताल जीवित अवस्था में है, शेष तालाबों के मात्र अवशेष बचे हैं, जिस पर ग्रामीण कब्जा कर खेती का कार्य करते हैं।

15वीं-16वीं सदी के इतिहास में है खटोला का उल्लेख
इतिहास के पन्नों में उल्लेख है कि 15वीं से 16वीं सदी के मध्य राजा दलपत शाह की बेटी तथा गढ़ाकोटा राज्य के गोंड़ शासक राजा हृदयशाह की पत्नी महारानी दुर्गावती के शासन काल में यह स्थान खटोला परगना के नाम से विख्यात था। चंदेल राज्य की सीमा से लगे गोंड़वाना राज्य के बुन्देलखण्ड में खटोला और शाहगढ़ जैसे किले हुआ करते थे। इतिहासकारों की माने तो खटोला के किले में सेनापति सूरजशाह तथा शाहगढ़ में बख्तब्ली शाह को सूबेदार के रूप में तैनात किया गया था। अकबर की सेना से युद्ध के दौरान महारानी दुर्गावती के मारे जाने के बाद सूरज शाह और बख्त बली शाह ने अपने-अपने राज्य घोषित कर खटोला और शाहगढ़ को स्वतंत्र गोंड़वाना राज्य घोषित कर दिया तथा स्वयं राजा बन गए। उस समय प्रजा को पानी उपलब्ध कराने के लिए यहां 52 कुंए, 84 बावड़ी तथा 7 तालाबों का निर्माण कराया गया था, जिनके जीर्ण-शीर्ण अवशेष आज भी हैं। जिस जगह से कभी राजसी गतिविधियां संचालित होती थीं वह आज गुंजन पहाड़ के नाम से इलाके में विख्यात है।

खटोला में रहते हैं सिर्फ कुशवाहा जाति के लोग
कालांतर में जब महाराजगंज में किले का निर्माण हुआ तो तत्कालीन सेनापति को महराजगंज से खटोला के वाशिंदों की देख-रेख के लिए नियुक्त कर दिया गया। अब खटोला का संचालन महाराजगंज से होने लगा, जिससे खटोला के लोग अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगे और खटोला को छोड़कर रानीताल, सेंधपा, बंधा, फुटवारी, मखनपुरा आदि स्थानों पर जा बसे। केवल कुशवाहा (काछी) जाति के लोग यहां से नही गए। तभी से इस गांव में सिर्फ कुशवाहा जाति के लोग ही निवास करते हैं। किवदंती है कि इस गांव में कुशवाहा जाति के अलावा कोई अन्य जाति का व्यक्ति मकान बनाकर नही रह सकता, यदि प्रयास करेगा तो उसके साथ अनर्थ हो जाएगा।