दमोह. बुंदलेखंड की कला को अगर अब भी कोई जीवित है तो वह है खजरी गांव यूं तो राई नृत्य रात में किया जाने वाला नृत्य है, लेकिन इस गांव में मर्यादाओं के बीच बच्चे, युवा, बुजुर्ग, युवतियां व महिलाएं एक साथ राई का आनंद उठाते है। दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक चलने वाले इस आयोजन के तीसरे दिन रविवार को अपार भीड़ उमड़ी।
खजरी गांव में मां चंडीजी के दरबार में छोटी सी जगह में एक मेला भरता है, इस मेले में सैकड़ों दुकानदार जहां दुकान सजाते हैं, वहीं इस चार दिवसीय मेले का मुख्य आकर्षण राई नृत्य रहता है। बुंदेली राई को जहां अश्लीलता से जोड़ा जाता है, ठीक इसके उलट इस राई नृत्य में मंडलियों द्वारा बुंदेली भजनों कृष्ण भजनों व भक्तों के बीच गायन वादन किया जाता है, जिसमें राई नृत्यांगनाएं अपना लोक नृत्य प्रस्तुत करती हैं।
खजरी गांव में दोपहर 2 बजे से शुरू हुए राई नृत्य के कार्यक्रम में एक-एक कर राई मंडली के कलाकार अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर अपनी प्रस्तुतियां देते रहे। इस मेले की खासियत यह रही कि भजन मंडलियां बदलती रहीं लेकिन वहीं चार राई नर्तकियां सभी भजन मंडलियों के साथ जोशो खरोश से अपनी कला का बखूबी प्रदर्शन करती रहीं। इन राई नर्तकियों को जरा सा विश्राम उस दौरान मिलता था, जब एक मंडली हटती थी और दूसरी मंडली अपनी तान छेड़ती थी। मंडलों में खजरी मंडल, सीगोन मंडल, जेरठ मंडल, हजारी तलैया दमोह मंडल, खंचारी पटी मंडल, महंतपुर मंडल, इमलाई मंडल व पालर मंडल शामिल रहे।