
अकलतरा. आधुनिकता के चकाचौंध में नगाड़े की थाप गुम हो गई है। अब यदा-कदा ही नगाड़े की शोर सुनने को मिलती है। पहले होली पर्व के एक माह पहले से ही नगाड़ा बजना शुरू हो जाता था, जबकि बड़ी संख्या में लोग फाग गीत गाने जुटते थे। अब महज होलिका दहन और इसके दूसरे दिन ही नगाड़ा बजता है। बदले दौर में नगाड़े का स्थान डीजे ने ले लिया है। अब लोग डीजे की धुन पर थिरकते हैं।
चारों ओर फाग गवैयों का मस्ती भरा शोर, स्वस्थ पारंपरिक लोक गीत लोगों के उत्साह को दोगुना कर देते हैं पर अब समय के साथ फाग गीतों की परंपरा ही विलुप्त हो रही है, वहीं पूरा जीवनशैली ही खत्म होने के कगार पर है। यहां एक-दो मंडली इस परंपरा को जीवित रखने की कवायद में जुटी हैं।
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फाल्गुन माह आते ही जगह-जगह पर फाग गीतों के लिए अलग से व्यवस्था की जाती थी। शाम ढलते ही नगाड़े का शोर लोगों को घर से निकलने के लिए विवश कर देते थे। साथ मिल-बैठकर पारंपरिक फाग गीतों की ऐसी महफिल जमती थी कि राह चलने वाले भी कुछ पल ठहर कर इस मस्ती भरे पल को अपने जेहन में उतार लेना चाहते थे।

उल्लेखनीय है कि आगामी १मार्च की रात होलिका दहन होगा और 2 मार्च को होली का त्योहार मनाया जाएगा। लेकिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्र से अब तक फाग गीत और नगाड़ों की धुन गायब है। वहीं गली-मोहल्लों में होलिका दहन के लिए भी अब तक तैयारी शुरू नहीं हुई है। पहले त्योहार के 15-20 दिन पूर्व ही गली-मोहल्लों में फाग गीत के साथ नगाड़ा बजाया जाता था। होलिकादहन के लिए लकड़ी एकत्र करने का काम भी शुरू हो जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। जानकारी के अनुसार परीक्षा के चलते बच्चों की टोली इन दिनों पढ़ाई में व्यस्त है। बड़ों के पास कामकाज से समय नहीं है, लिहाजा परंपराएं औपचारिकता में बदलती जा रही है।
जांजगीर शहर में नहीं पहुंचा नगाड़ा
जांजगीर शहर में नगाड़ा विक्रेता नहीं पहुंचे है। वहीं अकलतरा में गिने-चुने ही पहुंचे हैं। नगाड़ों का बाजार पूरी तरह से नहीं सज पाया है। हालांकि दो-तीन जगहों पर नगाड़ा लेकर विक्रेता बैठे हुए हैं। इन विक्रेताओं ने बताया कि 100 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक के नगाड़ा बनाए गए हैं। अभी गिने-चुने ग्राहक ही नगाड़ा लेकर गए हैं। विक्रेताओं का कहना है कि होलिका दहन से एक-दो दिन पहले तक ही नगाड़े की बिक्री में तेजी रहती है।