गाजीपुर. जिले की सदर कोतवाली अन्तर्गत धावां गांव में सैय्यद शाह अबुल गौस की मजार पर आप जब भी चले जाएं, भीड़-भीड़ मिलती है। लोग यहां मन्नतें मांगते हैं, कोई बीमार पहुंचता है तो किसी की मानसिक हालत खराब होती है। ऐसा दावा किया जाता है कि यहां आकर ऐसे बहत से मरीज ठीक होकर वाप गए हैं जिनके ठीक होने को लेकर डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। अब इसे आस्था कहें या अंधविश्वास, विज्ञान और कंप्यूटर के इस युग में भी धावा गांव में मौजूद इस दरगाह पर भीड़ लगता है।
पत्रिका न्यूज ने खुद वहां जाकर ऐसे कुछ लोगों से बात कर पता करने की कोशिश किया कि आखिर यहां लोग क्यों आते हैं और उनकी आस्था के पीछे तर्क क्या है। एक परिवार मिला जिसका दावा था कि वह अपनी बेटी का इलाज कराते-कराते थक गया, उसके बाद बच्ची को लेकर धावा पहुंचा। उनका दावा था कि धावां शरीफ पहुंचने के बाद एक सप्ताह में ही उनकी बिटिया ठीक हो गई। बावजूद इसके वह वहां रुके हुए थे। ऐसा क्यों ? सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि बाबा की मरजी थी कि वो यहां पर 40 दिन तक रहकर बाबा की दुआ लें। हमें बताया गया कि यदि मरीज ठीक नहीं हो पाता है तो उसे 40 दिन रुकने कीसलाह दी जाती है। फिर भी यदि सुधार न आए तो मरीज को वहां से अंबेडकर नगर स्थित किछौंछा शरीफ रेफर कर दिया जाता है। किछौंछा शरीफ में हजरत मकदूम शाह की मजार है। हमसे ऐसा दावा किया गया कि वहां पहुंचने पर किसी तरह भी प्रेतबाधा या मानसिक रोग हो ठीक होकर ही लौटता है।
वहीं हमें धावां धरीफ मजार पर कुछ ऐसे भी मानसिक रोगी मिले जिनके परिवार वालों ने डॉक्टर से इलाज कराने के बजाय उन्हें वहां बाबा की शरण में दे दिया था। ये कभी कुछ गाते तो कभी अपने बालों को खोलकर झूमते नजर आते। कुछ बाबा की मजार के पास लेटे पड़े रहते। ऐसे भी मरीज मिले जिन्हें जंजीरों में जकड़कर रखा गया था। रजौती नाम की एक महिला ने बताया कि वह पिछले कई महीने से चल नहीं पा रही थी। डॅाक्टर से पैर का इलाज कराया, पर वह सही नहीं हो पायी। उसने चलकर भी दिखाया, उसका दावा था कि वह अगर इतना चल पा रही है तो बाबा की कृपा है।
मजार की रखवासली करने वाले नसीमुद्दीन अंसारी ने बताया कि यहां पर मानसिक रोगी और भूत प्रेत से पीड़ित लोग आते है। बाबा की दुआ लेते हैं और ठीक होकर जाते हैं। अंसारी ने बताया कि धावा शरीफ गांव की नींव 1078 हिजरी पूर्व पड़ी थी। इसे आबाद करने के लिये उस समय के तत्कालीन गाजीपुर नवाब ने अबुल गौस साहब को जौनपुर से बुलाया था। वह उस वक्त के बड़े सूफी बुजुर्गों में से एक थे। वह गांव में आए और इसी दर को अपना आशियाना बना लिया। कहा कि इस मजान पर हिन्दू और मुसलमान सभी आते हैं।
दरअसल हिन्दुस्तान कि मिट्टी में हीरो परस्ती और आस्था कूट-कूटकर भरी हुई है। यह आस्था ही है कि विज्ञान के जमाने में भी लोग मजारों और आस्थानों व बाबाओं की शरण में जाते हैं और विश्वास करते हैं कि जो कहीं नहीं ठीक होगा वह यहीं ठीक होगा। अब डॉक्टर और विज्ञानी कुछ भी कहते रहें, पर सही बात तो यह है कि अगर यह अंधविश्वास है तो इसे दूर करने के लिये जागरूक करने में वो लोग फेल रहे हैं जो इन चीजों को नहीं मानते।