Rakhi Hajela
जयपुर के ब्लू पॉटरी की डिमांड अब विदेश के साथ देश में भी बढ़ रही है, लेकिन कारीगरों या आर्टिजनों की कमी के कारण इस कला को सहेज रहे गिने-चुने हाथ यह डिमांड पूरी नहीं कर पा रहे। मशीनी युग में आज भी यह कला हाथ से बनाई जाती है। वहीं इसमें कई दिन की मेहनत के बाद जो ब्लू पॉटरी के बर्तन तैयार होते हैं, वह पूरी नहीं हो पाती। वहीं अब पुराने कारीगर यह काम छोड़ रहे हैं और नई पीढ़ी भी इसे सीखने में रुचि नहीं ले रही।इन देशों में डिमांड
जयपुर ब्लू पॉटरी की डिमांड दुनियाभर में है। अमरीका, गल्फ कंट्रीज, इंग्लैंड के साथ अन्य यूरोपियन कंट्रीज में इसकी डिमांड है। वहीं जापान में भी इसका मार्केट विकसित हो रहा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वदेशी अपनाने के नारे से देश में असर नजर आ रहा है। कोविड के बाद देश में ब्लू पॉटरी की डिमांड बढ़ी है। दक्षिण भारत इसका सबसे बड़ा मार्केट है। साथ ही महाराष्ट्र, दिल्ली, कोलकाता से भी मांग बढ़ रही है।
– डेढ़ महीने में बनती मात्र 100 ब्लू पॉटरी
इसका एक पीस बनाने में तकरीबन डेढ़ माह लगते हैं। पूरा प्रोसेस 42 स्टेप्स में पूरा होता है। गौरतलब है कि मुल्तानी मिट्टी, कातिरा गोंद, सामान्य गम, सोडियम बाइकार्बोनेट और पानी के मिश्रण से ब्लू पॉटरी तैयार की जाती है। बर्तन बनाने के लिए क्वाट्र्ज, पत्थर के पाउडर का मिश्रण और ग्लास पाउडर का उपयोग किया जाता है। फिर इन्हें 850 डिग्री टेम्प्रेचर पर पकाया जाता है। करीब 20 कलाकार रोज 10 से 12 घंटे काम करते हैं। तब तैयार होती है चटक नीले रंग वाली ब्लू पॉटरी। ऐसे में जो डिमांड आती है, वह पूरी नहीं हो पाती।
सरकारी संरक्षण नहीं, कारीगर छोड़ रहे काम
सरकारी संरक्षण नहीं मिलने से ब्लू पॉटरी से जुड़े कारीगर कम हो रहे हैं। जो परिवार वर्षों से इससे जुड़े थे, कोविड के दौरान उन्होंने व्यवसाय बदल दिया। हालांकि हाल ही सरकार ने ब्लू पॉटरी के संरक्षण और संवद्र्धन के लिए सेंटर फॉर एक्सीलेंस स्थापित करने का निर्णय लिया है। यह घोषणा कब पूरी होगी कहा नहीं जा सकता, क्योंकि इसके लिए अभी तक जगह भी चिह्नित नहीं हो पाई है।यह है ब्लू पॉटरी
गौरतलब है कि ब्लू पॉटरी विलुप्त प्राय: कला में शामिल है। जानकारी के मुताबिक यह कला अकबर के समय ईरान से लाहौर आई। इसके बाद जयपुर के तत्कालीन महाराजा रामसिंह प्रथम लाहौर से इसे जयपुर लाए। इसमें परंपरागत हरे एवं नीले रंग का प्रयोग होता है। ये बर्तन शाही घरानों के रसोई की शान बढ़ाया करते थे, लेकिन अब इस पारंपरिक शिल्प कला को सहजेने में लगे हाथ चंद ही रह गए हैं।
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इनका कहना है,
ब्लू पॉटरी की डिमांड इतनी है कि हम इसे पूरा नहीं कर पा रहे। भारत की ही डिमांड पूरी नहीं हो पा रही। इसकी वजह कारीगरों की कमी है। सरकार को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए। जीएसटी की मार भी इस पर पड़ी है। इससे भी नुकसान हो रहा है।
अनिल दोराया, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त ब्लू पॉटरी आर्टिस्ट
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विदेश में तो ब्लू पॉटरी की डिमांड हमेशा से ही रही है, लेकिन अब देश में भी बढ़ रही है। इसमें सारा काम हाथ से होता है, जिससे समय अधिक लगता है और क्वांटिटी कम होती है। ऐसे में हम डिमांड पूरी नहीं कर पाते।
गोपाल सैनी, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त ब्लू पॉटरी आर्टिस्ट