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हज 2018: ताजा पैदा हुए बच्चे की तरह पाक होता है हाजी, एेसे बरसती है अल्लाह की रहमत

जोधपुर. हज मुस्लिम समाज की एक पाकीजा तीर्थ यात्रा है। पाकीजा इसलिए भी कहा जाता है कि हज करने के बाद इबादतगुजार इस तरह पाक हो जाता है कि मानो वह अभी अभी मां के पेट से पैदा हुआ हो। हाजी के सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं और वह हर तरह से पाक हो जाता है और उस पर अल्लाह की रहमत बरसती है। हज के दौरान हाजी चालीस दिन तक इबादत करते हैं।

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जोधपुर

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MI Zahir

Aug 01, 2018

जोधपुर. हज मुस्लिम समाज की एक पाकीजा तीर्थ यात्रा है। पाकीजा इसलिए भी कहा जाता है कि हज करने के बाद इबादतगुजार इस तरह पाक हो जाता है कि मानो वह अभी अभी मां के पेट से पैदा हुआ हो। हाजी के सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं और वह हर तरह से पाक हो जाता है और उस पर अल्लाह की रहमत बरसती है। मुफ्ती-ए-राजस्थान मौलाना शेर मोहम्मद खान ने यह बात बताई। उन्होंने बताया कि इस्लाम में हज फर्ज इबादतों में से एक फर्ज है। यह सऊदी अरब के मक्का और मदीना में की जाने वाली वार्षिक तीर्थ यात्रा है। मक्का को अल्लाह का पहला घर कहते हैं और मदीना में पैगम्बर हजरत मुहम्मद सअव की यादगार है। हज के दौरान हाजी चालीस दिन तक इबादत करते हैं।

 

यह है हज

मौलाना शेर मोहम्मद खान ने बताया कि हज अरबी शब्द है। मुस्लिमों की तीर्थयात्रा को हज कहते हैं। यह एक वार्षिक इस्लामी तीर्थ यात्रा है और मुस्लिम समाज सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में एकत्र होता है। हज उस शख्स पर फर्ज है जो सेहतमंद हो और जो अपने खर्च पर हज कर सकता हो। हज कर्ज ले कर नहीं किया जा सकता। मुफ्ती- ए-राजस्थान ने बताया कि इस्लाम में इबादत के पांच स्तंभ बताए गए हैं, हज इस्लाम के इन पांच स्तंभों में से एक है। साथ ही यह एक धार्मिक कर्तव्य है जिसे अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार पूरा करना हर उस मुस्लिम चाहे स्त्री हो या पुरुष का कर्तव्य है जो सेहतमंद होने के साथ साथ खुद अपना पूरा खर्च उठाने में सक्षम हो।

हज कब और कहां
उन्होंने बताया कि हज इस्लामी कैलेंडर के बारहवें और आखिरी महीने जिल्हज की आठवीं से बारहवीं तारीख तक की जाती है। इस्लामी कैलेण्डर चंाद पर आधारित कैलेंडर है, इसलिए इसमें पश्चिमी देशों में इस्तेमाल में आने वाले ग्रेगोरियन कैलेण्डर से ग्यारह दिन कम होते हैं। इसीलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार हज की तारीखें साल दर साल बदलती रहती हैं। हरम वो विशेष पवित्र धर्म स्थल है जिसमें हाजी हज के दौरान रहते हैं।

हज का महत्व,कैसे और अवधारणा
मुफ्ती-ए-राजस्थान मौलाना शेर मोहम्मद ने बताया कि हज सातवीं सदी से इस्लाम के पैगंबर हजरत मुहम्मद सअव की पाकीजा जिन्दगी से जुड़ा हुआ है। मुसलमान मानते हैं कि मक्का की तीर्थयात्रा की यह रस्म हजारों बरसों यानी हजरत इब्राहीम सअव के समय से चली आ रही है। हज के दौरान हाजी पूरा एक सफेद कपड़ा पहनते हैं, जिसे एहराम कहते हैं। हज यात्री उन लाखों लोगों में शामिल होते हैं, जो एक साथ हज के सप्ताह में मक्का में जमा होते हैं और यहं पर कई अरकान यानी अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं।

तवाफ, सफा और मरवाह

मारवाड़ हज वेलफेयर सोसाइटी के निदेशक हाजी इकरामुद्दीन ने बताया कि हज के दौरान हर हाजी एक घनाकार इमारत काबा के चारों ओर सात बार चलते हैं, जो कि मुस्लिमों के लिए प्रार्थना की दिशा है, इसे तवाफ कहते हैं। उन्होंने बताया कि हज के दौरान हाजी अल सफा और अल मारवाह नामक पहाडिय़ों के बीच आगे और पीछे चलते हैं, वह पाकीजा ज़मज़म के कुएं से पानी पीते हैं और चौकसी में खड़े होने के लिए अराफात पर्वत के मैदानों में जाते हैं और वहां एक शैतान को पत्थर मारने की रस्म पूरा करने के लिए पत्थर फेंकते हैं। उसके बाद हाजी अपने सिर मुंडवाते हैं, कुर्बानी करते हैं और इसके बाद तीन दिवसीय ईदुल जुहा त्योहार मनाते हैं। उसके बाद अपने अपने घरों के लिए लौट जाते हैं।