
जोधपुर. मुख़्तारे-दो जहां के नवासे हैं हुसैन,मजबूर मगर हुक्मे-ख़ुदा से है हुसैन, ऐ नहरे-फऱात अपने किनारों से उबल,ख़ेमे की तरफ़ दौड़ कि प्यासे हैं हुसैन …। पैगम्बर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और करबला के शहीदों की याद में मनाए गए मातमी मोहर्रम पर मशहूर शाइर मख्मूर सईदी के ये शेर चरितार्थ हुए। हजरत इमाम हुसैन और करबला के शहीदों की याद में शुक्रवार को आशूरा यानी मातमी मोहर्रम गमगीन माहौल मे अकीदत के साथ मनाया मनाया गया। अकीदतमंदों ने दो दिन रोजा रख कर पैगम्बर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हसन-हुसैन सहित करबला के शहीदोंं को याद कर मगफिरत की दुआएं मांगी। मस्जिदों में नफील नमाज के दौरान इमामों और खतीबों ने करबला की शहादत व मोहर्रम पर रोजा रखने की अहमियत बयान की। मातमी मोहर्रम पर शहर में कई मुकाम पर रखे गए आस्था के प्रतीक ताजियों पर शीरीनी चढ़ाने, मन्नत मांगने का सिलसिला दिन भर जारी रहा। विभिन्न अखाड़ों में उस्तादों के नेतृत्व में युवाओं ने हैरतअंगेज करतब से प्रतीकात्मक रूप से क्रूर शासक यजीद को ललकारा । कई जगह छबील लगाई गई और हलीम का भी वितरण किया गया। मुस्लिम घोसी समाज जोधपुर की ओर से मोहर्रम पर दूध की बिक्री बंद रख कर हाथीराम का ओडा चौराहा पर 35 हजार लीटर दूध से निर्मित शर्बत का वितरण किया। समाज के अब्दुल रज्जाक तुंवर ने बताया कि छबील पर शर्बत का वितरण सुबह ९ बजे से देर शाम तक जारी रहा। शहर खतीब पेश इमाम काजी मोहम्मद तैय्यब ने बताया कि फूल प्याले की रस्म २४ सितम्बर को होगी। हुज़ूर, हुसैन और हिंदुस्तान इस्लाम की प्रामाणिक किताब बुख़ारी शरीफ़ में यह जिक्र है कि पैग़म्बर हजऱत मुहम्मद ने कहा था, मुझे हिंदुस्तान की तरफ से राहत की ठंडी हवाएं और खुशबू महसूस होती है। आलिमों के मुताबिक़ पैगम्बर हजऱत मुहम्मद ने यह भविष्यवाणी की थी कि एक दिन ऐसा आएगा कि जिस तरह हमारे एहले-बैत यानी हजरत इमाम हुसैन के चाहने वाले अरब में हैं, वैसे ही अत्यधिक तादाद में वृहत्तर भारत में भी मौजूद रहेंगे। कालांतर में उनके नवासे हजरत इमाम हुसैन करबला में शहीद हुए। यह भविष्यवाणी सही साबित हुई, आज भारतीय उप महाद्वीप में इमाम हुसैन के चाहने वाले बेशुमार हैं। — करबला का प्रामाणिक इतिहास इस्लाम की प्रामाणिक पुस्तकों ख़ुतबाते-मुहर्रम़, बुख़ारी शरीफ़, करबला की कहानी-फिऱोज़ बख़्त अहमद व दीगर किताबों के अनुसार हजरत इमाम हुसैन की पैदाइश 5 शाबान, 4 हिजरी यानी 8 जनवरी 626 ईस्वीं में हुई थी। करबला की जंग इस्लामी हिजरी सन के मोहर्रम महीने की 10 हिजरी 61 को हुई थी। इस जंग का ईस्वीं सन 680 था। करबला में एहले-बैत या हजरत इमाम हुसैन का काफिला 72 से 82 व्यक्तियों का था। जबकि यज़ीदी फ़ौज में 22000 लोग शामिल थे। एहले-बैत के शहीदों की संख्या 17 थी। शहादत के वक्त इमाम हुसैन की उम्र 56 साल 5 महीेने और 5 दिन थी। इनके अलावा शहीद होने वाले ख़ादिमों व वहां के स्थानीय लोगों की तादाद इससे अलग है। ध्यान रहे कि ज्य़ादातर उलेमा ने यहां एहले-बैत की तादाद 72 मानी है, लेकिन ख़ुतबाते-मुहर्रम में यह तादाद 82 लिखी है। —