
जोधपुर. राज्य की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर में स्टूडेंट्स-हॉस्टलर्स पर भी जोधपुरी रंग चढ़ रहा है। उन्हें जोधपुर का खानपान, रहन सहन, बोली और यहां की स्थापत्य कला लुभा रही है। उनका कहना है कि यहां की बोली बहुत अच्छी और रेशमी है। नेशनल डिसेन्सी डे पर पत्रिका ने जोधपुर आईआईटियन नवीनकुमार मंगल से बात की तो उनकी यह राय उभर कर सामने आई।
शिष्टता ही जोधपुर का आभूषण
आईआईटी जोधपुर से पीएचडी कर रहे झुंझुनूं निवासी नवीनकुमार मंगल ने कहा कि जोधपुर के लोगों की बोली रेशम की तरह है। यह शिष्टता ही जोधपुर का आभूषण है। उनके शब्दों में, यह कहा जाता है कि अगर कोई देसी या विदेशी व्यक्ति एक बार जोधपुर आ जाए तो वह इस खूबसूरत शहर का हिस्सा बन जाता है। यह एक तरह से सूर्य की नगरी है जो आज भी राजस्थान और मारवाड़ की सभ्यता को जीवित रखे हैं यहां के लोग यहां का खाना रहने का ढंग और भाषा आज भी पुरानी है और आधुनिकता से जुड़ी हुई है।
पर्व और त्योहारों में भी संस्कृति
मंगल ने कहा कि यहां के पर्व और त्योहारों में भी संस्कृति झलकती है। धींगा गवर जैसा रात को मनाया जाने वाला त्योहार भी जोधपुर में ही मनाया जाता है। यहां की इमारतें और पत्थर एक रॉयल लुक देता है और भविष्य में भी मैं यही चाहूंगा कि जोधपुर के लोग इसको संजीव करके रखें हालांकि आज भी यहां के कई लोगों ने समय और परिस्थितियों के मुताबिक नई चीजों को भी अपनाया है परंतु पुरानी चीजों को आज भी जीवित रखा है।