मंडोर/जोधपुर. अनसुलझे रहस्यों और 1600 साल पुराने इतिहास को मौन पत्थरों में समेटे चौथी शताब्दी की विरासत मंडोर का उल्टा किला सदियों से सीधे होने की राह देख रहा है। कभी मारवाड़ की राजधानी रहा मंडोर किला वर्तमान में पूरी तरह जर्जर हो चुका है। चौथी शताब्दी के मांडव्यपुर कहे जाने वाले किले की प्राचीन दीवारें नष्ट होने के कगार पर पहुंच चुकी है। पुरातत्व विभाग के निर्देशन में मंडोर उद्यान में जमींदोंज हो चुके किले की खुदाई के दौरान पांचवी व आठवीं शताब्दी की गणेश, देवी की मूर्तियां, त्रिमूर्ति, शिव मंदिर , बर्तन, धार्मिक चिह्नों के साथ एक पूर्ण मंदिर भी मिला था। यहां मिले विक्रम संवत 894 के एक शिलालेख के अनुसार मंडोर में नागवंशी क्षत्रियों का राज्य था जिन्हें प्रतिहारों ने पराजित कर अपना साम्राज्य और मंडोर किला स्थापित किया। इन्दा परिहारों ने सन 1394 में राठौड़ों को दुर्ग दिया जिन्होंने बाद में 1459 में जोधपुर का मेहरानगढ़ दुर्ग बनाकर वहीं रहने लगे।
दो एकाश्मक स्तंभ में कृष्णलीला
मंडोर उद्यान में स्थित नागादड़ी जलाशय के पास ऊपर पहाड़ी पर बने मंडोर किले का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। किले के आस-पास 1998 में पुरातात्विक उत्खनन के दौरान दो एकाश्मक स्तंभ प्रकाश में आए जिस पर कृष्ण लीला के दृश्य उत्कीर्ण है। इन स्तंभों की तिथि पांचवी शताब्दी निर्धारित की जा सकती है। किले के आस-पास पुरा सामग्री जगह-जगह बिखरी पड़ी है।