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चल रही परंपरा और बुझ रहे दिए, कुछ इस तरह बयां किया अपना दर्द…देखें वीडियो
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चल रही परंपरा और बुझ रहे दिए, कुछ इस तरह बयां किया अपना दर्द…देखें वीडियो

दीपावली पर चाईना का असर ऐसा दिख रहा है कि दीवाली पर मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों ने कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया है।
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कानपुर

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Arvind Kumar Verma

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Updated: 6 Nov 2018, 3:10 PM IST

कानपुर देहात-कभी दीपावली का पर्व आते ही कुम्हारों के चेहरे पर चमक देखने को मिलती थी लेकिन आधुनिकता के इस दौर में एक ओर जहां लोगों के घरो में मिटटी के दियों की जगह इलेक्ट्रानिक झालरों ने ले ली है। वहीं देश में अब परम्परागत दीपावली के साथ ही कुम्हारों का वजूद भी विलुप्त होता नजर आ रहा है। पिछले दो दशकों से मिटटी के दियों का चलन धीरे-धीरे समाप्त हो गया है और मिटटी की दियालियो की जगह घरों में इलेक्ट्रानिक झालरों ने ले ली है। जिसमें चाइना की झालरों की कीमत सबसे कम होने के कारण लोगो का रुझान उसकी तरफ बढ़ता गया। आज हम अगर मिटटी की दियालियों की बात करेे तो महज 10 से 20 प्रतिशत मिटटी की दियालियो का ही उपयोग दीपावली के दिन किया जाता है। जिसकी वजह से भारत की इकोनामी का सीधा लाभ चाईना को मिल रहा है और इसकी सीधी मार इन कुम्हारों पर पड़ रही है। ऐसे में जहां एक ओर हम देश को आर्थिक चोट देकर चाईना को लाभ पंहुचा रहे है। वही हमारे देश के ऐसे कुम्हार, जो इसी मिट्टी के चाक से परिवार पाल रहे थे और त्यौहार की परंपरा निभा रहेे थे, इन दिनों भुखमरी का शिकार हो रहे है।

 

तालाब से मिली मिट्टी से लेकर दिए तक का सफर

पहले कुम्हारों को जो मिटटी उसे पैसो में खरीदनी पड़ती थी, अब वो उसे मुफ्त में मिलती है। पहले मिटटी के लिए उन्हें अब 12 से 15 सौ रूपये प्रति ट्राली रकम देने होती थी। साथ ही मिटटी के लिए एसडीएम साहब की परमिशन जरुरी हो गई थी लेकिन अब उन्हें इस प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना पड़ता है। इसके बाद भी कुम्हारो की स्थिति दयनीय बनी है। मिटटी के इस सफर में कुम्हारो को मिटटी घर पहुचने के बाद उसे पीटा जाता है। बड़े ढेलो को पीटने के बाद इस मिटटी को छन्ने से छाना जता है, ताकि मिटटी में एक भी कंकड़ न रह जाए। क्योकि एक भी कंकड़ आने पर बर्तन नहीं बनाए जा सकते। मिटटी को छानने के बाद उसे बारीक पीस लिया जाता है। जिसके बाद मिटटी गीली होकर चाक पर आती है, जहां उसे अलग अलग रूप दिया जाता है। क्योकि इस समय दीपावली का पर्व नजदीक है। लिहाजा इन दिनों दीपक की ओर इन कुम्हारो का ध्यान बढ़ जाता है। चाक पर मिटटी जब दिए की शक्ल ले लेती है तो उसे गेरू में रंगने का काम किया जाता है। जिससे दियालियो को लाल रंग मिल जाता है। इसके बाद इन दियालियों को पकाने के लिए ऐसी छोटी छोटी भट्टियों में रखा जाता है। रात भर आंच में पकने के बाद यह दियालिया बाजार तक पहुँचाई जाती है। खुद कुम्हारों की माने तो चाईना के सामान आने से सीधा असर उनके व्यापार पर पड़ रहा है। फाइवर की प्लेट व प्लास्टिक के ग्लासों के आने से बारह महीने चलने वाला कुम्हारो का यह धंधा चौपट हो चुका है। ऐसे में परिवार चला पाना मुश्किल पर रहा है और लोग भुखमरी की कगार पर आ चुके हैं। सरकार द्वारा कुम्हारों के इस धंधे के लिए कुछ भी नहीं किया जाता है।

 

क्या कहते हैं कुम्हार

कुम्हारों का कहना है कि चाइनीज झालरें बाजार में आने से अब मिटटी के दिए को कोई नहीं पूंछता है। वह अब दस दियाली ही खरीद रहा है। तमाम मुसीबतों के बाद जब सामान तैयार कर बाजार तक पहुंचने के बाद बिक्री नहीं होती है तो इस तरह से परिवार पालने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। कभी इसी चाक के सहारे परिवार को पालने वाले कुम्हार के परिवार की इस दयनीय हालात पर खुद परिवार सदस्य खासा परेशान है , परिवार की महिलाओ का कहना है कि जबसे प्लास्टिक के गिलास और फाइवर प्लेट बाजारों में आ गई है, तबसे आमदनी नहीं बची है, जिसकी वजह से परिवार के अन्य सदस्य इस धंधे को अब नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि इस व्यापार में अब कुछ भी नहीं बचा है।