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कानपुर

150 साल से ग्वालटोली में जीवित हैं फाग की परम्परा, बग्गड़-दउआ की टोली ने सबको मंत्रमुग्ध किया

ब्संत पंचमी से लेकर रामनवमी तक मनाते हैं होली का पर्व, टोली के जरिए मोहल्ले-मोहल्ले जाकर गातें फाग गीत, गंगा-जमुनी की दिखती तहजीब।

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कानपुर। होलिका दहन के बाद से रंग-गुलाल से पूरा शहर सराबोर है। कोरोना को मात देते हुए होरियारे होली के गीत गाकर जश्न के साथ पर्व को मना रहे हैं। पिछले 150 सालों से सनातन संकीर्तन मण्डल लगातार बसंत पंचमी के दिन से रामनवमी तक होली पर्व मनाता है। मंगलवार की सुबह बग्गड-दउआ की टोली यहां से निकल कर फाग के जरिए सबको मंत्रमुग्ध कर रही है।

होरियारों की निकली टोली
रंगों के पर्व होली को लेकर सुबह नगर ग्वालटोली से होरियारों की टोली निकली और मैनावती मार्ग स्थित पारंपरिक होली गीत का आयोजन किया गया। इस दौरान फगुआ गीतों व वाद्य यंत्रों की धुन पर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये। इस दौरान गीत सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे। कलाकारों ने अवधी, फगुआ, उलारा, चैता, बेलवइया, चहका, धमार आदि गीत की शानदार प्रस्तुति दी।

झूमने को किया मजबूर
सनातन संकीर्तन मण्डल के तत्वावधान में कलाकारों ने फगुआ, धमार, होली आदि गीतों से उपस्थित श्रोताओं को झूमने के लिए मजबूर कर दिया। कार्यक्रम में कलाकारों ने जोगीरा सा रा रा रा..। होली खेलयं रघुबीरा अवध में होली खेलयं रघुबीरा..। आदि गीत प्रस्तुत किया। सभी ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर होली की बधाई देते हुए गले लगाये। इस मौके पर लोगों ने गुंझिया के साथ अन्य पकवान फाग के सदस्यों को खिलाई तो वहीं छतों से फूलों की वर्षा भी की गई।

क्या है फाग
संयोजक भानू प्रताप द्विवेदी, ने बताया कि फाग का दर्शन अष्टांग योग से संबंधित है इसमें योग, आसन, प्रणायम, ओम-ध्वनि, धारणा, ध्यान और विशेष परिस्थितियों में लोगों को समाधिस्त होते हुए भी देखा गया हैं। इस विधा में डूब जाने पर ऐसा महसूस होता है कि ईश्वर हमारे करीब है। रजनीश ओसो ने भी अपने ध्यान की विधा में लेज को जोड़ा है। फाग गायकों को जीवन में सरलता, अध्यात्मिकता, निरामिसता का संचार होता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का अनुभव होता है।

ऐसे होती है फाग की शुरूआत
संयोजक ने बताया कि फाग की शुरूआत में प्रभु गणेश, माँ भगवती, बाबा भोले एवं आदि देवी देवताओं का आवहन किया जाता है एवं उसके बाद भांग ठंडाई का प्रसाद बनाकर लोगों को वितरित किया जाता है। चैताला में चार पद होते हैं। दुतासा में दो पद एवं लेज एक पद में गायी जाती है। लेज में एक पद होते हुए भी इसमेें उतार चढ़ाव के साथ अष्टांग योग की कई क्रियाएं होती है जिसमें ओम ध्वनि उच्चरण सभी लोग मिलकर करते हैं जिससे ओम ध्वनि का वर्तुल ब्रहमांड में शंख ध्वनि की तरह प्रवाहित होता है।

यहां पर गाई जाती फांग
संयोजक बताते हैं कि कानपुर में ग्वालटोली, शिवाला, धनकुट्टी, परमट, नवाबगंज आदि में आज भी फाग गाया जा रहा है। कहते हैं हमारे बुजुर्गों ने अंग्रेजी शासनकाल में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में फाग गीतों के माध्यम लोगों को एकत्रित एवं जाग्रत किया। चैताला एवं दुतासा में कृष्ण, राम एवं भोले शंकर के भजन गाये जाते हैं और गायक देवताओं सानिध्य प्राप्त करने लगता है। होली के समय फाग मण्डली सभी घरों में जाकर फाग का गायन करती है। लोग फाग को ध्यान और मनोरंजन से सुनते हैं होली में घरों की छतों से महिलाएं, पुरूष एवं बच्चे फाग मण्डली पर पुष्पों वर्षा एवं रंगों का छिडकाव करते हैं।

टोली के सदस्य
स्ंयोतक बताते हैं कि कानपुर में फाग के प्रमुख गायक विष्णु दादा, मनौआं, आनन्द भूषण मिश्र, ईश्वरी प्रसाद बाजपेयी, कैलाश दादा, विख्यात ढोलक वदक अनिल अवस्थी, पं. गोमती प्रसाद, शत्रुघन लाल दीक्षित, दिनेश तिवारी आदि प्रमुख लोग है जो फाग विधा को जीवित किए हुए हैं। वहीं युवा वर्ग भी फाग में सम्मलित हो रहे हैं, जिसमेें गुड्डू पाठक, विकास अवस्थी, हरिओम मिश्रा, पंकज, मोहित श्याम द्विवेदी आदि हैं। कहते हैं कि आधुनिकता के युग में जिस तरह से हमारे युवा इस विद्या को जिवन्त किए हुए हैं उससे लगता है कि फाग का भविष्य अच्छा है।