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VIDEO: राजस्थान के इस प्रसिद्ध पशु मेले के अस्तित्व पर संकट, हर वर्ष कम हो रही पशुओं की आवक
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VIDEO: राजस्थान के इस प्रसिद्ध पशु मेले के अस्तित्व पर संकट, हर वर्ष कम हो रही पशुओं की आवक

करौली. प्रदेश के प्रमुख दस पशु मेलों में शुमार करौली का श्री शिवरात्रि पशु मेले का अस्तित्व संकट में है। यह मेला पशुओं की संख्या को देखते हुए वर्ष प्रति वर्ष सिमटता जा रहा है। रियासतकाल से भरने वाले इस मेले की प्रदेश में खासी पहचान रही है। पशु पालन विभाग के बड़े मेलों में यह शामिल है, लेकिन पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मेले में आने वाले पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है।
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करौली

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Dinesh Kumar Sharma

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Updated: 24 Feb 2024, 3:55 PM IST

करौली. प्रदेश के प्रमुख दस पशु मेलों में शुमार करौली का श्री शिवरात्रि पशु मेले का अस्तित्व संकट में है। यह मेला पशुओं की संख्या को देखते हुए वर्ष प्रति वर्ष सिमटता जा रहा है। रियासतकाल से भरने वाले इस मेले की प्रदेश में खासी पहचान रही है। पशु पालन विभाग के बड़े मेलों में यह शामिल है, लेकिन पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मेले में आने वाले पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। विशेष रूप से गोवंश की संख्या में कमी आई है। हालांकि इस अवधि में उष्ट्रवंश की संख्या में कुछ वृद्धि तो हुई है, लेकिन मेले में आने वाले कुल पशुओं की संख्या कम होती जा रही है।

आंकड़ों को देखें तो 7-8 वर्ष पहले मेले में 6-7 हजार से अधिक पशु आते थे। पशुपालन विभाग के अधिकारी अब गोवंश की संख्या में कमी आने को लेकर मशीनीकरण युग बताते हैं, लेकिन सच्चाई यह भी है कि पशुपालकों को पर्याप्त सुविधाओं के अभाव के चलते उनका मेले के प्रति रूझान कम होता गया। पहले मेले में कई दिन तक रौनक छाती थी।

1964 से विभाग कर रहा आयोजन
प्रसिद्ध शिवरात्रि पशु मेले का आयोजन पशुपालन विभाग की ओर से किया जा रहा है। वर्ष 1964 से यह मेला विभाग के हाथों आया, तभी से मेले का आयोजन पशुपालन विभाग कर रहा है, उससे पहले नगरपालिका की ओर से मेले का आयोजन कराया जाता रहा।

किस वर्ष, कितने पशु
शिवरात्रि मेले में पहले प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रदेश के विभिन्न जिलों से विभिन्न वंश के पशु आते रहे हैं। इनकी प्रदेश के ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश से आने वाले पशुपालक खरीदारी करते हैं। वर्ष 2016 में शिवरात्रि पशु मेले में जहां कुल 5126 पशुओं की आवक हुई थी, वहीं 2017 में यह संख्या घटकर 4686 रह गई। इसके बाद गत वर्ष यानि 2018 में इस संख्या में और कमी आई और मेले में 4585 पशु आए। इसके अगले वर्ष यानि 2019 में तो पशु आवक की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई और महज 1288 पशु ही आए। जबकि वर्ष 2020 में यह संख्या 915 रही तो 2021 में कोराना के चलते मेला आयोजित नहीं हुआ। वर्ष 2022 में संख्या और सिमटकर 456 ही रह गई, जबकि गत वर्ष 2023 में पशु आवक का आंकड़ा महज 539 पशुओं पर ही ठहर गया।

इन स्थानों से आते रहे हैं पशुपालक
विभागीय सूत्रों के अनुसार मेले में पहले प्रदेश के नागौर, पाली, राजसमंद आदि जिलों से विशेष रूप से ऊंट आते थे। वहीं गौवंश करौली, धौलपुर, सवाईमाधोपुर व मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों से लाए जाते। जबकि मेले में पशु खरीदने के लिए राजस्थान के कई जिलों के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश से पशुपालक आते रहे हैं।
इस बार 105 ऊंटों की आवक
पशुपालन विभाग की ओर से आयोजित किए जाने वाले करौली के शिवरात्रि पशु मेले के प्रति पशुपालकों में पहले जबरदस्त उत्साह नजर आता रहा है, लेकिन इस बार तो यह उत्साह भी नहीं दिख रहा। पिछले वर्षों तक हर बार स्थिति यह रही है कि मेले के उद्घाटन की निर्धारित तिथि से पांच-सात दिन पहले से ही मेला मैदान पर पशुपालक पशुओं को लेकर आ जाते थे और पशुओं की खरीद-फरोख्त हो जाती। इतना ही नहीं अनेक पशुपालक तो रवानगी के लिए पैनल्टी रवन्ना चुकाकर पशु लेकर लौट जाते। उद्घाटन तिथि आते-आते तो मेला मैदान में बहुत कम संख्या में पशु रह जाते हैं, लेकिन इस बार मेला मैदान पर यह स्थिति भी नहीं है। मैदान पर उष्ट्रवंश के अलावा अन्य पशुओं की संख्या नगण्य है। इस बार मेला मैदान पर अब तक 105 ऊंटों की आवक हुई है।

इनका कहना है
यह सही है कि मेले में पशुओं की संख्या में कमी हो रही है। इसका प्रमुख कारण यंत्रीकरण है। मशीनीकरण के चलते खेती में भी उपयोगिता कम हुई है। इससे पशुपालकों का मेले के प्रति रूझान कम हुआ है। विभाग की ओर से सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा जाता है।
डॉ. गंगासहाय मीना, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग, करौली