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श्रीमहावीरजी(हिण्डौनसिटी). हिण्डौन उपखण्ड के श्रीमहावीरजी स्थित दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र देशभर के जैन धर्मावलबियों की आस्था का केन्द्र है। यहां विराजित जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की स्वयंभू प्राकट््य प्रतिमा के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। खास बात यह कि क्षेत्र के अजैन भी लोकदेव के रूप में भगवान महावीर को पूजते हैं।
जिओ और जीने दो के संदेश से पूरित अतिशय क्षेत्र में चैत्र मास में भगवान के जन्मकल्याणक महोत्सव के अवसर पर आयोजित होने वाले भगवान महावीर के वार्षिक मेले में हजारों श्रद्धालु हिस्सा लेने पहुंचते हैं।
यूं तो वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन मेले में 8 दिन तक चांदनपुर वाले बाबा के दरबार में भक्ति और श्रद्धा की बयार कई गुना बढ़ जाती है। जनोत्तर भगवान महावीर के जन्म कल्याणक महोत्सव के मौके पर भगवान के मंदिर में आकर चरण वंदन करते हैं और भगवान की ऐतिहासिक रथयात्रा का हिस्सा बनते हैं। वहीं दूसरी ओर अतिशय क्षेत्र के अजैन लोग भी मनौती और शुभकार्यों पर भगवान महावीर को पूजते हैं। विवाह के समय दूल्हा जब बारात लेकर निकलता है तो सर्वप्रथम वह भगवान महावीर की चौखट पर धोक लगाकर ही बारात लेकर आगे बढ़ता है।
गंभीर नदी के तट पर प्रगटे चांदनपुर वाले बाबा
मुख्य मंदिर के समीप गांव चांदनगांव के जंगल में गंभीर नदी बहती है, जिसके तट पर बालू के टीले से उद्भव होने से भगवान महावीर चांदनपुर वाले बाबा को टीले वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता है। इसी परम्परा में रथयात्रा के दिन भगवान महावीर स्वामी का गंभीर नदी के जल से मस्तकाभिषेक होता है। अतिशय क्षेत्र प्रबंधक नेमीकुमार पाटनी बताते हैं कि इतिहास के अनुसार वर्ष 1771 से पूर्व भी मंदिर निर्माण के साक्ष्य मिले हैं। करौली रियासत के चांदनपुर में लगभग 450 वर्ष पूर्व एक ग्वाले की गाय जंगल में चरने जाती, लेकिन शाम को ग्वाला के दुहने पर दूध नहीं निकलता। अन्य द्वारा दूध दुहने की आशंका में ग्वाले ने गाय की पीछा किया। जंगल में चरते हुए एक टीले के ऊपर पहुंचते ही गाय के थनों से स्वत: ही दूध झरने लगा। ग्वाले ने टीले की खुदाई शुरू की, लेकिन शाम तक कुछ नहीं मिला। बताते हैं कि रात में ग्वाले को देवों ने स्वप्न दिया कि तुम्हारी गाय ने अपने दूध से भगवान का अभिषेक किया है। तुम टीले की खुदाई करो। प्रभु दर्शन देकर मनोकामना पूर्ण करेंगे। ग्वाले ने फिर से खुदाई की तो टीले से भगवान महावीर की मूंगावर्णित पद्मासन प्रतिमा का उद्भव हुआ।
इसलिए कहलाए टीले वाले बाबा
प्रतिमा का उद्भव होने के बाद टीले वाले बाबा के रूप में भगवान महावीर को झोपड़ी बनाकर विराजित किया गया।
करीब एक दशक से मंदिर में पूजा विधान कर रहे पंडित मुकेश जैन शास्त्री बताते हैं कि झोपड़ी में विराजित टीले वाले बाबा की ख्याति फैलने लगी। इसके बाद वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।