
कोटा. चुनावों में कौनसा क्षेत्र किस पार्टी का गढ़ है इसकी खास चर्चा रहती है, राजनीतिक इतिहास में बहुत कम ऐसे उदाहरण देखने को मिलेंगे जब एक पार्टी ने विरोधी पार्टी को उसी की रणनीति से मात दी हो। राजनीति फिर राजनीति ठहरी..बेवजह थोड़ी कहा जाता है कि जंग, प्यार और चुनावों में सब जायज है।
राजस्थान की राजनीति का वह घटनाक्रम जिसने जयपुर से लेकर दिल्ली तक तहलका मचा दिया…
साल 1998…सीट कोटा (वर्तमान में उत्तर और दक्षिण), उम्मीदवार भाजपा के दिग्गज नेता और कोटा से 5 बार के विधायक ललित किशोर चतुर्वेदी..सामने कांग्रेस के बड़े नेता शांति धारीवाल। प्रदेश में कांग्रेस की लहर होने के बावजूद भाजपा की जीत तय मानी जा रही थी लेकिन शांति धारीवाल ने ऐसी सोशल इंजीनियरिंग अपनाई की न केवल भाजपा का सबसे बड़ा गढ़ ध्वस्त हुआ बल्कि चतुर्वेदी से जैसे कद्दावर नेता को 24000 मतों के भारी अंतर से हार झेलना पड़ी। चतुर्वेदी इस हार से इतने आहत हुए कि उन्होंने अगला चुनाव कोटा से न लड़कर दीगोद विधानसभा से लड़ा। हालांकि 1998 के बाद हुए 3 चुनावों में यहां भाजपा का ही परचम लहराया लेकिन 1998 की हार इतिहास में दर्ज हो गई।
राजस्थान के इस शहर में बीमारी नहीं ग्रह-नक्षत्रों
के हिसाब से दी जाती है रोगी को दवा..
सवर्ण वोट बैंक में लगी सेंध
मंदिर के आंदोलन से पहले भाजपा को शहरी जनाधार वाली पार्टी माना जाता था। 90 के दशक में सवर्णों के साथ अन्य जातियों के मतदाता भी भाजपा के साथ जुड़े। 1998 के चुनावों में धारीवाल की चुनावी इंजीनियरिंग के चलते दक्षिणपंथी विचार वाले लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया वहीं कांग्रेस के परम्परागत वोटर्स जिसमें मुस्लिम, पिछड़ी जातियां शामिल हैं ने भाजपा के खिलाफ एकतरफा वोट देकर धारीवाल की जीत सुनिश्चित कर दी।