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दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत हैं ये दिव्यांग, ऐसे चलाते हैं परिवार
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दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत हैं ये दिव्यांग, ऐसे चलाते हैं परिवार

काफी इलाज के बाद भी नहीं आई थी आंखों की रोशऩी

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मऊ

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Sarweshwari Mishra

Jan 10, 2018

मऊ. दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना और मन में हौसला हो तो सारी परिस्थियां अनुकूल हो जाती हैं। इस बात को चरितार्थ कर रहा है मऊ का अशोक कुमार पाण्डेय। यह आंखों से देख तो नहीं सकता लेकिन अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण कर समाज के प्रेरणाश्रोत बन चुका है।

 

दूसरों के लिए प्रेरणाश्रोत बने दिव्यांग अशोक

दिव्यांग अशोक कुमार पाण्डेय एआरटीओ ऑफिस में वरिष्ठ सहायक लिपिक के पद पर तैनात है जिसको काम करते हुए देख दूसरों को प्रेरणा मिल रही हैं। एआरटीओ आफिस में वरिष्ठ सहायक लिपिक के पद पर तैनात नेत्रहीन बाबू अशोक कुमार पाण्डेय बचपन से ही नेत्रहीन दिव्यांग हैं। लेकिन अपने काम और हुनर के दम पर ये एआरटीओ ऑफिस में वरिष्ठ सहायक लिपिक के पद पर तैनात है जिसको काम करते हुए देख दूसरों को भी प्रेरणा देने का काम करते हैं।

 


अशोक कुमार पाण्डेय देविरया जिले के भठवा गांव के रहने वाले हैं। इनके तीन भाई और दो बहने हैं, दो भाई नौकरी करते हैं और पिता की मौत हो चुकी है। माता-पत्नी, दो बेटे और दो बेटी साथ में रहते हैं बताते है कि वहीं इनको काम करने में कोई परेशानी नहीं होती है हुनर को को देख हर कोई दातों तले उगली दबा लेता हैं। बचपन में ही भगवान ने दोनों आखों की रोशनी छीन ली थी, फिर भी जिन्दगी को जूनून की तरह से जिन्दगी जीते हैं। अशोक कुमार को दोनों आंख नहीं है फिर वो अपने काम को बबूखी अन्जाम देते हैं।

 


ARTO ऑफिस में फार्म बेचने का करते हैं काम
दिव्यांग अशोक कुमार एआरटीओ ऑफिस में काउन्टर पर फार्मो बेचने का काम करते हैं। जिसको वो बखूबी ढंग से निभाते हैं। फार्म बेचते समय ग्राहकों के द्वारा जो रुपये दिए जाते हैं उसका भी बखूबी हाथ से पकड़कर पहचान लेते है। दस रुपये बीस रुपये की नोट के साथ बड़े नोटो को पहचान करने में कभी धोखा नहीं खाते हैं। बताते हैं कि जो नई नोट आई है उसको नहीं पहचान पाते हैं। लेकिन दूसरे सहयोगियों से पूछकर पहचान करते हैं। इसके अलावा अपने आलमारी में रखे हुए परिवहन विभाग के सभी पेपरों को बखूबी पहचानने के साथ ही किस फार्म को किस काम के लिए प्रयोग करना है उसको आलमारी से जरूरत के अनुसार निकालते है। इस काम में ये कभी धोखा नहीं खाते। इसके अलावा मोबाइल पर कोई भी नम्बर आसानी से लगा कर बात भी करते हैं। जिसको देखने के बाद हर किसी को प्रेरणा मिलती है कि कभी भी दूसरे पर आश्रित नहीं होना चाहिए।

 

काफी इलाज के बाद भी नहीं आई आंखों की रोशऩी
जो लोग दिव्वाग है उनको निराश होने की जरुरत नही हैं । वो अपने काम को ईमानदारी के साथ करे उनको निश्चित ही सफलता मिलेगी । बता दें कि अशोक कुमार पाण्डेय की आंखो की रोशनी 1978 में चली गयी शुरुआती दिनों मे मोतियाबिन्द समझकर डॉक्टर इलाज करते रहे लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ जिसके बाद तीन बार ऑपरेशन भी हुआ लेकिन सही नहीं हुआ। हालांकि इसके बाद बताते हैं कि नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइन्ड संस्था के तहत इनको सचिवालय लखनऊ में नौकरी मिली तो करने लगे। वहां ये डेढ़ वर्ष तक नौकरी करते रहे फिर आठ अप्रैल 1999 में आरटीओ ऑफिस में नौकरी मिल गयी तो वहां से छोड़कर आजमगढ़ जनपद में ज्वाइनिंग किया। उसके बाद वहां से स्थानान्तरण होकर मऊ आ गये और अब यहां नौकरी कर रहे हैं।

 

ऑफिस में ऐसा है इनका काम

इनके साथ काम करने वाले प्रभाकर बताते है कि वो नियमित रुप से इनके घर जाते है और इनको लेकर ऑफिस आते है, और फिर वो वापस घर ले जाते है। फार्म खरीदने के लिए आने वाले लोग बताते है कि इनका काम बहुत ही अच्छा होता है, और इनसे काम के दौरान किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं होती है। वहीं अधिकारियों का भी कहना है कि ऑफिस के स्टाफ में अशोक कुमार पाण्डेय हैं जो दोनों आंखों से अंधे हैं, और वरिष्ठ सहायक लिपिक के पद पर कार्यरत है। आज तक इनकी कोई भी शिकायत या परेशानी सुनने को नहीं मिली।

By- VIjay Mishra