नागौर. रामपोल सत्संग भवन में चल रहे सत्संग में कथा वाचक राधेश्याम शास्त्री ने कहा कि मानव का जीवन खुद की सुविधा के लिए संसाधनों की व्यवस्था करने में ही व्यतीत हो जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का शरीर बेहद मुश्किल से भगवान की प्रसन्नता से प्राप्त होता है। प्रत्येक को कर्मानुसार फल प्राप्त होता है। सत्कर्म है तो अच्छा जीवन मिलता है, नहीं तो 84 प्रकार की योनियों में भटकना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को सत्कर्म करने के साथ ही भगवत भक्ति करनी चाहिए। दुष्कर्मों की क्षमा नहीं प्राप्त होती है। मनुष्य ने अच्छे कर्म यानि की सत्कर्म किए हैं तो उसे उसी अनुसार फल मिलेगा, और दुर्जन है तो उसे भी उसके कर्मानुसार ही परिणाम स्वरूप प्राप्त होता है। कहने का अर्थ है कि सत्कर्म के साथ ही ईश्वरीय भक्ति करनी चाहिए। अक्सर लोग सत्संग में कम आते हैं, जबकि सत्संग में ज्यादा आना चाहिए। सत्संग में संतों की वाणी से अध्यात्मिक मार्ग का दुष्कर पथ प्रशस्त होता है। दुर्गम राह भी सत्संग से सहज-सरल हो जाती है। इसलिए मानव को खुद को मंगल स्वरूप बनाना चाहिए। ईष्र्या, लोभ एवं काम आदि शत्रु हैं। इनका शमन करना पड़ेगा, तभी सत्कर्म होगा। सत्कर्म होने पर मानव खुद-ब-खुद भगवान के नजदीक पहुंचने लगता है। रामनामी महंत मुरलीराम महाराज ने कहा कि मानव जीवन मिला है तो फिर इसका सदुपयोग करना चाहिए। मानव को मानवीयता पूर्वक अपने कर्म करने चाहिए। वर्तमान में मानवीयता का क्षरण होने लगा है। इस पर भी ध्यान देना होगा। मानवीयता ही सत्संग का आधार है। कर्मों के फल से कोई नहीं बच सकता है। कालचक्र का पहिया जब घूमता है तो फिर उसके चक्र में सभी को आना पडुता है। इसलिए मानव को चाहिए कि वह सत्संग जरूर करे। इससे उसकी भगवान के प्रति भक्ति की भावना और उच्चतम स्तर पर पहुंचेगी। उन्होंने कहा कि भक्ति में समर्पण होना चाहिए। समर्पण का अर्थ है कि खुद को अर्पित कर देना। इसलिए मानव ने यदि खुद को भगवान के समक्ष अपने को समर्पित कर दिया है तो फिर भगवान उसका कल्याण जरूर करते हैं। इस दौरान नंदकिशोर बजाज, नंदलाल प्रजापत, कांतिलाल कंसारा, मनोज कुमार शर्मा, केवलचंद टेलर एवं दाऊदयाल शर्मा आदि मौजूद थे।