सदियों पुरानी गैर ने फिर जगाई एकता की ज्योत, होली के शोर में होती है श्रीमाली समाज की फक्कड़
300 से 550 वर्ष पुरानी श्रीमाली ब्राह्मण समाज की धूल होली आज भी राठौड़ काल की विरासत को कर रही जीवंत
नागौर. जब पूरा शहर रंगों की तैयारी में जुटता है, तब श्रीमाली ब्राह्मण समाज की गैर और धूल होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, अनुशासन और सामाजिक समरसता की जीवंत मिसाल के साथ ही एक सांस्कृतिक धरोहर समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम करती है। राठौड़ शासनकाल में सामाजिक सौहार्द स्थापित करने के उद्देश्य से प्रारंभ हुई यह परंपरा आज भी उसी गरिमा और मर्यादा के साथ निभाई जा रही है। 300 से 550 वर्ष पुरानी यह विरासत पीढिय़ों को जोडऩे का माध्यम बन चुकी है।
होलाष्टक से गूंजती भक्ति की स्वर लहरियां
श्रीमाली समाज के बुजुर्गों के अनुसार होलाष्टक लगते ही गणेश वंदना और राजाज्ञा के साथ आयोजन का शुभारंभ होता है। समाज के लोग सर्वप्रथम महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन कर मंगलकामना करते हैं। इसके बाद धनेश्वर महादेव मंदिर में प्रतिदिन होली गायन का रियाज होता है, जहां भक्ति, परंपरा और सामूहिकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
एकादशी पर फक्कड़ गैर, शिवबाड़ी तक समरसता की यात्रा
एकादशी के दिन समाज की फक्कड़ गैर शिवबाड़ी तक पहुंचती है। यहां पुष्करणा समाज की गैर भी शामिल होती है। परंपरा निर्वहन के पश्चात गैर पुन: महालक्ष्मी मंदिर पहुंचकर विधिवत विसर्जित होती है।
धूल गैर और झगड़ा होली: मतभेद मिटाने की अनोखी रस्म
नागौर की पहचान बनी धूल गैर में गुलाल की जगह धूल का प्रयोग होता है। समाजजन एक-दूसरे पर धूल डालते हुए प्रतीकात्मक झगड़ा करते हैं, जिसे झगड़ा होली या फक्कड़ होली कहा जाता है। इस रस्म के माध्यम से समाज आपसी मनमुटाव भुलाकर भाईचारे और एकता का संदेश देता है।
धुलण्डी के दूसरे दिन जीजी गैर का भावपूर्ण समापन
धुलण्डी के दूसरे दिन जीजी गैर महालक्ष्मी मंदिर से प्रारंभ होकर भैरूजी के भजन गाते हुए ब्रह्मपुरी पहुंचती है। सामूहिक भजन के बाद गैर पुन: मंदिर में विसर्जित होती है। आयोजन के अंत में समाजजन एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। समाज इस परंपरा का सबसे भावनात्मक और प्रेरक क्षण मानता है।
परंपरा में संस्कृति, श्रद्धा और वेशभूषा की गरिमा
विशेष अवसरों पर अमर ढूंढ आयोजन, दीर्घायु की कामना तथा शिव विवाह और शिवरात्रि से प्रेरित मंगलभावनाओं का समावेश किया जाता है। पारंपरिक वेशभूषा में धोती, कोला और पगड़ी आज भी इस आयोजन की शान बनी हुई है। महिलाओं की गैर भी अलग से आयोजित होती है, जिससे समाज में समग्र सहभागिता सुनिश्चित होती है।
सबसे वयोवृद्ध सहभागीरू परंपरा के ध्वजवाहक
76 वर्षीय अशोक त्रिवेदी श्रीमाली समाज की गैर में सबसे वयोवृद्ध सहभागी के रूप में विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका उत्साह युवाओं से कम नहीं दिखा। पारंपरिक धोती.पगड़ी में सजे अशोक त्रिवेदी पूरी ऊर्जा के साथ गैर में शामिल हुए और होली गायन में भी सहभागिता निभाई। उन्होंने कहा कि यह परंपरा केवल उत्सव नहींए बल्कि समाज की पहचान हैए जिसे सहेजकर रखना हर पीढ़ी की जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि बुजुर्गों का कर्तव्य मार्गदर्शन देना और युवाओं का दायित्व उसे आगे बढ़ाना है। गैर में उनकी सक्रिय उपस्थिति ने साबित कर दिया कि परंपरा उम्र की मोहताज नहीं होतीए बल्कि श्रद्धा और समर्पण से जीवित रहती है।
श्रीमाली ब्राह्महण समाज: यह सांस्कृतिक धरोहर है
यह परंपरा राठौड़ काल से सामाजिक सौहार्द के उद्देश्य से प्रारंभ हुई थी और आज भी अनुशासनपूर्वक निभाई जा रही है।
महेन्द्र श्रीमाली, अध्यक्ष श्रीमाली ब्राह्मण समाज
युवाओं की सक्रिय भागीदारी और बुजुर्गों के मार्गदर्शन से परंपरा निरंतर सशक्त बनी हुई है।
गणेश त्रिवेदी, कोषाध्यक्ष, श्रीमाली ब्राह्मण समाज
धूल गैर और फक्कड़ होली ने समय के साथ पूरे समाज को एक सूत्र में पिरो दिया है।
अरुण त्रिवेदी
पारंपरिक वेशभूषा और धार्मिक मंगलभावनाएं इस उत्सव की विशिष्ट पहचान हैं।
कुलदीप श्रीमाली
फक्कड़ गैर केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं सामाजिक धरोह भी है।
कांतिलाल बोहरा