– छह घण्टे चला धरना
-दरियाव आश्रम में नवरात्रा में शिलालेख लगाने व संत के परिजन आश्रम में नहीं ठहरने के आश्वासन पर माने
नागौर जिले के कुचेरा कस्बे मेंखजवाना रोड स्थित दरियाव आश्रम के लिए भूमिदान करने वाले भामाशाह व उनके परिवारजों के नाम का शिलालेख तोड़ने को लेकर आश्रम में रहने वाले संत सुखदेव व माली समाज के लोग आप में उलझ पड़े। करीब छह घण्टे चले माली समाज के धरना प्रदर्शन के बाद संतों और माली समाज के मौजिज लोगों की समजाइश व शिलालेख वापस लगाने के आश्वासन के बाद धरना समाप्त किया गया।
खजवाना रोड स्थित दरियाब आश्रम के लिए करीब चार दशक पूर्व भामाशाह रामेश्वरलाल, रामपाल गेहलोत की ओर से करीब साढ़े तीन बीघा भूमि दान की गई थी। करीब डेढ़ महीने से चल रहे मंथन के बाद गुरुवार को रेण आचार्य सज्जनराम महाराज से चर्चा के बाद भामाशाह परिवार व माली समाज ने आश्रम के मुख्य द्वार के बाहर शिलालेख लगवाया। शुक्रवार सुबह साढ़े नौ बजे के करीब शिलालेख तोड़ने की सूचना मिलने पर शहर सहित आसपास के गांवों से माली समाज के लोग मौके पर एकत्रित हो गए और धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। सूचना मिलने पर भोपालगढ़ सहित कई जगहों से संत भी आश्रम पहुंच गए। मूण्डवा तहसीलदार बुधारामसोहू व कुचेरा थानाधिकारी मुकेश चौधरी मय जाप्ता मौके पर पहुंचे। समाज के लोगों ने आश्रम की जमीन बेचने सहित अन्य अवांछित गतिविधियों का आरोप लगाते हुए वहां रहने वाले संत सुखदेव से आश्रम खाली करवाने की मांग रख दी।
मामला बढ़ता देख माली समाज नागौर के अध्यक्ष कृपाराम देवड़ा, रेणपीठ के आचार्य सज्जन राम महाराज, पौ धाम महंत रामनिवास दास महाराज मौके पर पहुंचे और लोगों से समझाइश शुरू की। करीब साढ़े तीन बजे समझाइश के बाद मामला शांत हुआ।
कई बार चला मंथन
मामले को लेकर संतों व माली समाज के प्रतिनिधि मण्डल के बीच पुलिस थाने में प्रशासन की उपस्थिति में वार्ता हुई। उसके बाद आगामी नवरात्रा में शिलालेख लगवाने व संत के परिजनों को आश्रम में नहीं ठहराने सहित विभिन्न मांगों पर सहमति बनी। पौ धाम महंत रामनिवास दास व कृपाराम देवड़ा की ओर से इस संबंध में जिम्मेदारी लेने पर माली समाज के लोग धरना समाप्त करने पर सहमत हुए।धरने के दौरान भामाशाह परिवार के रामपाल गहलोत, घनश्याम, गोविन्द गहलोत, माली समाज के उपाध्यक्ष दामोदर टाक सहित समाज के कई मौजीज लोगों ने समझाइश की।
इन मांगों पर बनी सहमति
नवरात्र में शिलालेख लगाने, जमीन नही बेच सकने, संत के परिवार के किसी भी सदस्य के आश्रम में नही रहने, सिर्फ संत ही ठहरने व पूजा एवं भजन कीर्तन करने पर सहमति बनी।