
नागौर. शहर के बीकानेर रेलवे फाटक (सी-61) पर निर्माणाधनी रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) के लिए 16 जनवरी को बंद की गई फाटक अब तक नहीं खुल पाई है, जबकि बंद करते समय तीन महीने का समय मांगा था। छह महीने से अधिक समय होने के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि फाटक और कितने दिन बंद रहेगी। जिम्मेदार अधिकारी हो या फिर जनप्रतिनिधि इस मामले में मौन साधे बैठे हैं और जनता परेशान हो रही है। फाटक पार जाने के लिए बनाया गया वैकल्पिक रास्ता पूरी तरह खराब हो चुका है, जबकि पटरियों के नीचे से निकलने वाले दुपहिया वाहन चालक भी बारिश का पानी भरने पर परेशान होते हैं, लेकिन जिम्मेदारों का एक ही जवाब है, ‘प्रयास तो कर रहे हैं, अब और क्या कर सकते हैं।’
गर्डर रखने के लिए पांच दिन से खड़ी है क्रेनें
आरओबी के अधूरे भाग को पूरा करने के लिए अब रेलवे पटरियों के ऊपर स्टील के गर्डर रखने हैं, जिसके लिए करीब दो महीने पहले एनएच के अधिकारियों ने रेलवे को पत्र लिखा। रेलवे ने पहले तो पुराने फॉर्मेट की बजाए नए फॉर्मेट में सूचना भेजने के लिए कहा। नए फॉर्मेट में सूचना भेजे हुए करीब एक माह हो चुका है, लेकिन अब तक रेलवे का ब्लॉक नहीं मिला है। ठेकेदार ने स्टील के गर्डर रखने के लिए पांच दिन पहले हाई पॉवर वाली दो क्रेनें मंगवा ली है। मंगलवार को रेलवे टीम के नागौर आने की सूचना भी थी, लेकिन शाम तक नहीं पहुंच पाई। इधर, ठेकेदार ने मंगलवार को क्रेन के जैक लगाकर गर्डर रखने के लिए सेट कर दिया। अब जैसे ही रेलवे से ब्लॉक मिलेगा, स्टील के गर्डर रखे जाएंगे।
लेटलतीफी के पीछे बड़ा खेल तो नहीं
शहर के बीकानेर रेलवे फाटक पर पिछले सात साल से आरओबी का काम रुक-रुक कर चल रहा है। पहले वाले ठेकेदार की ओर से काम अधूरा छोडऩे पर गत वर्ष दूसरे ठेकेदार को शेष कार्य पूरा करने के लिए 9.56 करोड़ का ठेका दिया गया, जिसे जून 2024 में काम पूरा करना था। हालांकि ठेकेदार के काम की गति काफी धीमी थी, लेकिन दूसरी तरफ रेलवे से भी समय पर ब्लॉक नहीं मिला। कारण चाहे कुछ भी रहे, लेकिन अब ठेकेदार ने समय बढ़ाने के लिए एनएच के अधिकारियों को पत्र लिखा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ईपीसी मोड के कार्यों में समय पर काम नहीं करने पर ठेकेदार पर प्रतिदिन के हिसाब से पैनल्टी लगाई जाती है, लेकिन यदि कार्य का समय बढ़ाया गया तो पैनल्टी तो माफ होगी ही, साथ ही ठेकेदार को महंगाई भत्ता भी देना होगा। यानी काम में देरी से ठेकेदार को दोहरा लाभ होगा और सरकार को दोहरा नुकसान। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि कहीं पूरा खेल इसलिए तो नहीं खेला जा रहा, क्योंकि रेलवे का ब्लॉक समय पर मिल जाता तो भी ठेकेदार समय पर काम पूरा नहीं कर पाता।