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….. तो समाप्त हो जाएगा मोरवा शहर के सबसे पुराने बाजार का अस्तित्व

शहर का उजड़ेगा 10 हजार से अधिक आशियाना, निर्जन गांव में पुनर्स्थापना

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एनसीएल ने नगर निगम क्षेत्र के 20 किलोमीटर दूर चिह्नित भलुगढ़, गोंदवाली व दादर गांव को लेकर शुरू की कवायद

सिंगरौली. अब बस कुछ ही दिनों की बात है। सिंगरौली जिले के सबसे पुराने मोरवा शहर का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आलीशान होटल और वर्षों की तपस्या से स्थापित व्यावसायिक प्रतिष्ठान सहित आशियाने उजड़ जाएंगे। वर्षों पुराने शासकीय व निजी शैक्षणिक संस्थानों को नए सिरे से फिर से स्थापित करना होगा। ये सब किसी भी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मोरवा जैसा शहर फिर से बसाना इसलिए भी मुमकिन नहीं लग रहा है। क्योंकि पुनर्स्थापना के लिए चयनित स्थल नगर पालिक निगम की सीमा से 25 किलोमीटर और दूर निर्जन गांव हैं। इस तरह 40 हजार से अधिक आबादी वाले सात दशक से अधिक पुराने शहर मोरवा का अस्तित्व की समाप्त हो जाएगा।

कोयला कंपनी नार्दन कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) ने जयंत व दुद्धिचुआ कोयला खदान को विस्तार देने की योजना के तहत मोरवा शहर को विस्थापित करने का निर्णय लिया है। विस्थापन की प्रक्रिया तेजी के साथ शुरू हो गई है। वर्तमान में शहर के रहवासियों की भूमि व परिसंपत्तियों के मूल्यांकन और मुआवजा देने के बावत भौतिक सत्यापन चल रहा है। मोरवा शहर को उजाड़ कर यहां के रहवासियों की पुनर्स्थापना के लिए मोरवा से 20 किलोमीटर दूर बरगवां के पास दादर, भलुगढ़ व गोंदवाली गांव को चुना गया है। रहवासियों की ओर से इन गांवों में बसाहट को लेकर शुरू हुआ पुरजोर विरोध भी अब ठंडा पड़ गया है। इधर, जिला प्रशासन से स्वीकृति के बाद एनसीएल ने पुनर्स्थापना को लेकर भी कवायद तेज कर दी है।

उजाड़ेंगे 1485 हेेक्टेयर का शहर, 332 हेेक्टेयर में बसाएंगे

एनसीएल की ओर से अब तक की बनाई गई योजना 1485.66 हेक्टेयर में फैले शहर को उजाडकऱ 332.3 हेक्टेयर में बसाने की है। मोरवा शहर को दो हिस्सों में विभाजित कर अधिग्रहण किया जा रहा है। एक भाग मोरवा बाजार क्षेत्र का और दूसरा भाग बाजार का बाहरी क्षेत्र है। पहला हिस्सा 1211.75 हेक्टेयर और दूसरा हिस्सा 273.91 हेक्टेयर का है। जबकि पुनस्र्थापना के लिए चिह्नित गांव भलुगढ़ में 204.89 हेक्टेयर, गोदवाली में 107.52 हेक्टेयर व दादर में 19.89 हेक्टेयर जमीन पुनर्स्थापना के लिए चिह्नित की गई है।

राजनीतिक रूप ले लिया रहवासियों का आंदोलन, दब गई आवाज

विस्थापन के बाद भलुगढ़, दादर व गोंदवाली में बसाहट का विरोध व नगर निगम सीमा में बसाए जाने की मांग, परिसंपत्तियों का उचित मूल्यांकन, किसे माना जा रहा विस्थापित की जानकारी देने जैसे कई मांग रहवासियों ने एनसीएल के समक्ष रखा है। विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ मुद्दों पर आंदोलन भी शुरू हुआ, लेकिन सक्रिय दो मंच के बीच पूरे मामले का राजनीतिकरण हो गया। सिंगरौलीपुनस्र्थापना मंच व सिंगरौली विस्थापन मंच ने शुरू में तो एक सुर में आवाज उठाई, लेकिन कुछ ही दिनों में दोनों अलग-अलग राग अलापने लगे। इसके पीछे मंच में शामिल लोगों का अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से जुड़ा होना माना जा रहा है। एक मंच कांग्रेस से जुड़े लोग शामिल हैं तो दूसरे मंच में भाजपा के लोग हैं। नतीजा रहवासियों के मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया।

एनसीएल मुख्यालय के ही ठौर का पता नहीं

विस्थापन की इस प्रक्रिया में एनसीएल मुख्यालय की पुनस्र्थापना कहां होगी। इसका भी अभी कोई खुलासा नहीं हुआ है। जबकि रहवासी लगातार एनसीएल ये जानना चाह रहे हैं कि मुख्यालय को कहां स्थापित किया जाएगा। दरअसल एक बड़ी संख्या में मोरवा के रहवासियों व उद्यमियों का रोजगार व कारोबार एनसीएल मुख्यालय पर ही निर्भर है। यही वजह है कि रहवासी एनसीएल मुख्यालय के इर्द-गिर्द ही बसना चाहते हैं। लेकिन एनसीएल प्रबंधन की ओर से इस बात का खुलासा नहीं किया जा रहा है। एनसीएल की यहां जिला मुख्यालय वैढऩ और हर्रई में पर्याप्त जमीन है। लेकिन करीब पांच वर्ष पहले मुख्यालय को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में भी स्थापित किए जाने की चर्चा शुरू हुई थी। यही कारण है कि रहवासी संदेह की स्थिति में हैं।

पहले मोरवा को बसते देखा, अब उजड़ते देखेंगे

मोरवा के विस्थापन की प्रक्रिया तो काफी लंबे समय से चल रही है। 7 दशक से अधिक पुराने शहर से लोगों का दिली लगाव हो गया है। स्वयं मैने शहर को बसते देखा है। अब उजड़ते देखेंगे। विस्थापन की प्रक्रिया जिस तरह से चल रही है। पुनस्र्थापना की जो योजना बनाई गई है। उससे नहीं लगता है कि मोरवा जैसा अब कोई नया शहर विस्थापन के बाद बस पाएगा। भलुगढ़, दादर व गोंदवाली में एक चौथाई लोग बस जाएं तो बड़ी बात है। नगर निगम सीमा में वैढऩ के आस-पास पुनस्थार्पना की योजना बनाई गई होती तो निश्चय ही नया शहर बसता, लेकिन भलुगढ़ जाने के बजाए लोग अलग-अलग स्थानों में स्थापित होंगे। नगर निगम के बाहर बसने के बजाए लोग पुनस्र्थापना का पैकेज लेना ही ज्यादा पसंद करेंगे। मोरवा शहर के उजडऩे से लोगों का आशियाना तो उजड़ेगा ही कई ऐसे लोग भी प्रभावित होंगे, जो इस शहर के विस्थापित तो नहीं हैं लेकिन छोटी-बड़ी दुकानों के जरिए उनकी रोजी-रोटी जरूर चल रही है।

एसपी सिंह, रहवासी व उद्यमी मोरवा शहर।

प्रभावित होने वाले सार्वजनिक उपक्रम

10 निजी व शासकीय स्कूल

04 सामुदायिक भवन

05 प्रतिष्ठित बड़े बैंक

08 निजी व शासकीय अस्पताल

04 निजी व शासकीय कॉलोनी

15 बड़े प्रतिष्ठित होटल व गेस्ट हाउस

(विस्थापन में एनसीएल मुख्यालय, बस स्टैंड, पोस्ट ऑफिस, नगर निगम कार्यालय, उपखंड वन मंडल, बिजली ऑफिस व मोरवा थाना सहित अन्य सार्वजनिक संपत्ति व संस्थाएं उजड़ेंगी।)

फैक्ट फाइल

70 वर्ष से अधिक पुराना शहर है मोरवा

40 हजार से अधिक है शहर की आबादी

10 हजार से अधिक आशियाना उजड़ेगा

1485 हेक्टेयर में शहर की है बसाहट

332.3 हेक्टेयर में पुनस्थार्पना होगी