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कांठल में कपास का घट रहा रकबा, महंगी होती खेती से मुंह मोडऩे लगे किसान

प्रतापगढ़. गत दो दशक से पहले तक कांठल में कपास की बहुतायत स्तर पर खेती की जाती थी। लेकिन महंगी होती खेती के कारण कपास का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में अब जिले में बहुत ही कम इलाकों में कपास की खेती रह गई है। कांठल में पिछले कुछ वर्षों से […]

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प्रतापगढ़. गत दो दशक से पहले तक कांठल में कपास की बहुतायत स्तर पर खेती की जाती थी। लेकिन महंगी होती खेती के कारण कपास का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में अब जिले में बहुत ही कम इलाकों में कपास की खेती रह गई है। कांठल में पिछले कुछ वर्षों से कपास की खेती से किसान कतराने लगे है। हालात यह है कि इसका रकबा एक हजार हैक्टेयर में सिमटकर रह गया है। बहुत कम क्षेत्र में कपास के खेत देखे जा सकते है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष कपास की बुवाई का आंकड़ा एक हजार हैक्टेयर में सिमट गया है।
वर्ष में एक ही फसल
कपास की बुवाई में पानी की आवश्यकता होती है। इसकी बारिश शुरू होने से पहले की जाती है। जबकि इसमें उत्पादन अक्टूबर माह से शुरू होता है। जो जनवरी-फरवरी तक होता है। इससे कपास की बुवाई करने वाले खेत में केवल कपास की पैदावार ही ली जा सकती है। रबी और खरीफ दोनों फसलों के स्थान पर एक ही फसल होती है। इस कारण भी किसानों का इसकी खेती सेे मोह भंग हो रहा है। मेहनत अधिक, मुनाफा कम
मेरियाखेड़ी. कपास की खेती में मेहनत अधिक होने और मुनाफा कम होने से किसानों का रुझान कम होता गया। किसानों की माने तो कपास में कीट व्याधियों का भी प्रकोप अधिक रहता है। शुरुआत में तो कृषकों ने संकर बीजों की बुवाई की, लेकिन मेहनत अधिक व मुनाफा कम होने के कारण कपास की खेती से किनारा कर लिया। दूसरी ओर पिछले कुछ वर्षों से खेतों में कीट व्याधियां बढऩे लगी है। इसका असर कपास की फसल में भी हो गया है। कपास में कीटव्याधि भी अधिक होने लगी है। जिससे कृषकों को कीटनाशकों का अधिक उपयोग करना पड़ रहा है। जिससे अतिरिक्त आर्थिक भार उठाना पड़ता है। जो किसानों पर भारी पडऩे लगा।
नहीं दिखती देसी किस्म
जिले में कपास की देसी किस्म की बुवाई पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत क्षेत्र में की जाती थी।इसमें मेहनत अधिक और पैदावार कम होने से किसानों ने किनारा कर लिया। इसके बाद किसानों ने बीटी कॉटन किस्म की बुवाई करने लगे। इससे देसी किस्म तो गायब ही हो गई। वहीं पहाड़ी भागों में भी इसकी जगह अन्य फसलों ले रहे है।

जिले में यह हैं आंकड़ा
वर्ष बुवाई का क्षेत्रफल
२०१४ १२७०
२०१५ १२५०
२०१६ ११५०
२०१७ ११३०
२०१८ १०४५
२०१९ १११०
२०२० १०६३
२०२१ ११८०
२०२२ १०१०
२०२३ ९५०
२०२४ ९२०
आंकड़ा कृषि विभाग के अनुसार ( हैक्टेयर में)

काफी कम हो गई कपास की खेती
जिले में गत वर्षों से कपास की खेती काफी होती जा रही है। इसके मुख्य कारण महंगी खेती होना है। इसके साथ ही इसकी बुवाई में एक ही फसल मिलती है। जबकि किसान इसकी बजाय खरीफ और रबी की दोनों फसलें ले सकता है। इस कारण इसका रकबा अब कम होता जा रहा है।
बंशीधर मीणा, संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग, प्रतापगढ़.