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वाराणसी

एड्स और कैंसर से बच सकते हैं पर इस रोग का कोई इलाज नहीं, ये है जल और वायु प्रदूषण का प्रकोप

बीएचयू की न्यूरोलॉजिस्ट टीम ने बनाई फिल्म, दुनिया के वैज्ञानिकों से की रोग के समुचित इलाज के लिए रिसर्च की अपील।

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डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

 

वाराणसी. विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति से छेडछाड़ किस कदर घातक होती जा रही है मानव जाति पर इसका अंदाजा लगा पाना आसान नहीं। आलम यह कि जैसे जैसे देश व दुनिया भर में विकास के नाम पर प्रकृति का पहले अंधा दोहन किया गया, फिर उसे बर्बाद किया गया। जल से जंगल तक को बर्बाद और तबाह किया गया अब उसका परिणाम स्पष्टतः सामने दिखने लगा है। आकाश से पाताल तक में लगातार फैल रहा प्रदूषण का जहर कितना घातक हो सकता है यह भी परोक्ष और अपरोक्ष रूप से दिखने लगा है। प्रदूषण चाहे जल का हो या वायु का वह इतना घातक स्तर तक पहुंच गया है कि अब ऐसी-ऐसी बीमारियों का असर दिखने लगा है जिनका कोई इलाज ही नहीं है। एक बार ऐसे रोगों की चपेट में आए तो मरना तय है। यह रोग ज्यादा वक्त भी नहीं देता। महज दो माह से अधिकतम डेढ़ साल के भीतर मरीज का दम तोड़ना तय है। इतना ही नहीं एक बारगी इस रोग की चपेट में आने के बाद मरीज तिल-तिल कर हर क्षण मरता ही रहता है। अब तो बनारस सहित पूर्वांचल में भी इस रोग ने तेजी से पांव पसारना शुरू कर दिया है। ऐसे में बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की टीम ने इस अति गंभीर बीमारी के इलाज के लिए दुनिया के वैज्ञानिकों से अपील की है। उन्होंने इसके लिए एक फिल्म भी तैयार की है जो सेंसर बोर्ड के पास है अभी। डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अपील की है कि वह इस अत्यंत घातक रोग की दवा के इजाद के लिए देश में शोध शुरू कराएं। इसकी शुरूआत अगर उनके संसदीय क्षेत्र काशी से हो तो और भी बेहतर होगा।

कलाकार हरीश द्विवेदी काशी की प्रदूषित हो चली गंगा को अपलक निहारते

इस संबंध में बीएचयू के न्यूरोलॉजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ विजय नाथ मिश्र ने पत्रिका से खास बातचीत में बताया कि एक अच्छा खासा जिंदादिल आदमी भी इस घातक बीमारी की चपेट में कब आ जाए कहा नहीं जा सकता। उन्होंने बताया कि मोटर न्यूरॉन डिजिज (एमएनडी) दुनिया भर के लिए लोगों के लिए अभी तक रहस्य बनी है। कुछ दिन पहले तक यह भी पता नहीं था कि यह रोग होता क्यों है, ऐसे में इसका कोई इलाज भी नहीं, कोई दवा तक नहीं बनी है जो मरीज को राहत प्रदान कर सके। उन्होंने बताया कि इस रोग में दिमाग की नसें और रीढ़ की हड्डी की नसें (स्पाइनल काऱ्ड) गलने लगती हैं। न्यूान सेल डैमेज होने लगते है। ब्रेन काम करना बंद कर देता है। बताया कि हाल के दिनों में हुए सर्वे में पता चला है कि यह रोग जल स्त्रोतों में अल्युम्यूनियम, क्रोमियम और जिंक की बहुलता के चलते तेजी से बढ़ रहा है। कहा कि मां गंगा सहित देश व दुनिया भर की नदियों में हेवी मेटल टॉक्सिसिटी इस रोग के फैलने में सहायक हो रही है। इसी तरह वायु प्रदूषण भी इसमें सहायक हो रहा है। मसलन हेवी कार्बन मेटेरियल्स, कार्बन मोनो ऑक्साइड की वायुमंडल में अधिकता इस रोग के लिए मददगार साबित हो रही है।

उन्होंने बताया कि यूं तो यह रोग दुनिया के हर कोने में है लेकिन विकासशील देशों यानी तीसरी दुनिया तथा भारत फिर उत्तर भारत और वाराणसी व पूर्वांचल में इस रोग से पीडि़तों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। बताया कि एक बारगी इस रोग के गिरफ्त में आने के बाद न्यूनतम डेढ़ से दो माह और अधिकतम डेढ़ से दो साल का ही जीवन होता है। मरीज रोजाना तिल-तिल कर मरता है। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में पोलियो की रोकथाम के लिए अरबों-खरबों रुपये खर्च कर दिए गे। एड्स व कैंसर के इलाज के लिए दवाएं खोज ली गई हैं। वैसे इन तीनों ही रोगों में रोगी के पास वक्त कुछ वक्त होता है लेकिन एमएनडी के रोगी के पास वक्त भी नहीं होता। वह अपने बारे में, रोग के बारे में और शहर की बद से बदतर होती आबो हवा, प्रदूषित होते जल के बारे में ही सोचता रहता है। वह इस तरह की सोच से खुद को उबार भी नहीं पाता और एक दिन वह सब कुछ भी खत्म हो जाता है।

कलाकार हरीश द्विवेदी और अलका राय

एमएनडी के लक्ष्ण

उन्होंने बताया कि एमएनडी के 38 प्रकार हैं जिसमें से दो प्रकार के रोगों में तो किसी तरह मरीज को बचाया जा सकता है लेकिन शेष 36 प्रकार में मौत तय है। उन्होंने बताया कि इस रोग के तहत हाथ-पैर में अकड़न, मांसपेशियों में फड़फड़ाहट, हाथ-पांव सूखने लगते हैं, खाने में दिक्कत, निगलने में दिक्कत होती है। फेफड़े की मांसपेशियां भी कमजोर हो जाती हैं।

हरीश द्विवेदी और अलका राय डॉ के चैंबर में

केस स्टडी

केस-1
गाजीपुर निवासी अमरपाल उम्र 62 वर्ष, जब वह 60 वर्ष की अवस्था में पोस्ट्मास्टर पद से सेवानिवृत्त हुए तभी बीचयू के नूरॉलॉजी विभाग में आए। उन्हें कंधे एवं पैर की माशपेशियों में फड़फड़ाहट की शिकायत थी एक महीने से। छह महीने बाद पैर और हाथों की मांसपेशियां गल गईँ। खाना घोटने में दिक़्क़त होने लगी। कोई दवा काम नही कर रही थी। फिर एक दिन दवा खाते समय वह सरक गई, दो महीने तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया। मर्ज शुरू होने के दो वर्ष के भीतर ही उनकी मौत हो गई।


केस-2
चुनार निवासी फ़ातिमा बीबी एक दिन आईं ओपीडी (बहिरंग विभाग) में, उन्हें तीन महीने से सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी। कुछ भी निगल नहीं पा रही थीं। इलाज शुरू हुआ लेकिन तीन महीने बाद ही एक दिन खाना खाते समय एक निवाला सरक गया और उनकी मौत हो गई। इसे बलबर एमएन डी कहा जाता है।


केस-3
वाराणसी निवासी 35 वर्षीय बदरीनाथ पिछले एक साल से इस मर्ज से जूझ रहे है। हाथ पैर सूख रहा है। खाने में दिक़्क़त है। अब चलना फिरना मुश्किल हो गया है।

फ़िल्म the Dying Man & his Dying city के ये हैं कलाकार

 

उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में इस बीमारी का कोई इलाज नही ऐसे में मरीज रोज़ धीरे धीरे-धीरे मृत्यु के आग़ोश में चला जाता है। विश्व में सबसे भयावह बीमारियों में से एक, मोटर नूरॉन डिज़ीज़ पर आधारित, नरेंद्र आचार्य की 18 मिनट की फ़िल्म “the Dying Man & his Dying city” तैयार की गई है। इस फ़िल्म में बीएचयू के नूरॉलॉजी विभाग के डोक्टरों प्रो. दीपिका जोशी, प्रो अभिषेक पाठक, प्रो. रामेश्वर चौरसिया के अलावा वाराणसी की अलका राय और हरीश सेवत द्विवेदी, हरेंद्र शुक्ला आदि ने काम किया है। साथ ही मैं खुद और मेरी पत्नी भी इस फिल्म का हिस्सा हैं। इसका फिल्म का उद्देश इस बीमारी के बारे में लोगों को बताना और चिकित्सकों तथा वैज्ञानिकों से इस पर और अधिक से अधिक रीसर्च करेने की अपील करना है ताकि रोगियों के इलाज के लिए दवा का इज़ाद हो सके। इस फिल्म में हरीश द्विवेदी और अलका राय ने उम्दा कार्य किया है।

एमएनडी के मरीज की भूमिका में हरीश द्विवेदी, पत्नी की भूमिका में अलका