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वाराणसी

चीन से बचा कर यहां पर डिजिटल फार्म में सुरक्षित रखे गये दुलर्भ बौद्ध ग्रंथ

हिमालयी पारंपरिक पुस्तकों को भी हुआ संरक्षण, जानिए क्या है कहानी

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वाराणसी. चीन ने तिब्बत पर आक्रमण करके उस पर कब्जा कर लिया था और इस लड़ाई में बौद्ध धर्म से जुड़ी कई चीजे नष्ट हो गयी थी। इसके बाद भी बौद्ध अनुयायियों ने अपने धर्म के पवित्र ग्रंथ के बचाने के लिए उसे लेकर भारत आये थे और अब यही पवित्र ग्रंथ को डिजिटल फार्म में सुरक्षित रखा गया है। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण पांडुलिपी, हिमालयी पारंपरिक पुस्तक भी यहां पर सुरक्षित रखी गयी है जहां से प्राचीन ज्ञान का प्रकाश आज भी सभी को राह दिखा रहा है।
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सारनाथ के केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय में स्थित शांतरक्षित ग्रंथालय अपने आप में बेहद अनोखा है। नालांदा विश्वविद्यालय के भारतीय बौद्ध विद्वान आचार्य शांतरक्षित के नाम पर ही इस ग्रंथालय का नाम रखा गया है। यह पुस्तकालय कितना कीमती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां पर 1 लाख 11 हजार से अधिक बौद्ध व संस्कृत से जुड़े ग्रंथों को सुरक्षित रखा गया है। ग्रंथों का डिजिटलाइजेशन कर दिया गया है, जिससे इन्हें संरक्षित रखने में आसानी हुई है। मन्टीमीडिया विभाग के जरिए इन ग्रंथों का ऑडियो, वीडियो, कैसेट, सीडी, एमपी थ्री व फोर के साथ डीवीडी फार्म में सुरक्षित रखा गया है। इसके बाद इन ग्रंथों की माइक्रोफिल्म व माइक्रोफिश भी बनायी गयी है। मल्टी मीडिया के रुप में मौजूद इन ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए देश व दुनिया से बड़ी संख्या में लोग आते हैं।
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जहां पर ग्रंथ होने की मिलती है जानकारी, वहां पर जाती है टीम
केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय के लोग बौद्ध व संस्कृत ग्रंथों को लेकर बेहद संवेदनशील रहते हैं। देश के किसी हिस्से से भी ऐेसे ग्रंथे होने की जानकारी मिलती है तो वहां पर टीम जाती है औश्र उन ग्रंथों को डिजिटल फार्म में तैयार करके ग्रन्थालय में ले आते हैं, जिससे वह संरक्षित व सुरक्षित हो जाता है।
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चीन भी नहीं मिटा पाया है तिब्बत का इतिहास
चीन ने लाख प्रयास किया था कि तिब्बती इतिहास को खत्म कर दिया जाये। इसके बाद भी तिब्बती लोगों ने अपने धर्म के साथ ग्रंथों की भी रक्षा करने में सफल हुए है। शांतरक्षित ग्रंथालय में सुरक्षित यह ग्रंथ अब चीन के हाथ से दूर हो चुके हैं और ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि तिब्बत का इतिहास व बौद्ध धर्म कितना गौरवशाली रहा है।
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