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56 इंच की छाती को क्या हो गया, जवान-जवान बच्चें मारे जा रहे, सरकार बनाए किन्नरों की बटालियन और देखें फिर…
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56 इंच की छाती को क्या हो गया, जवान-जवान बच्चें मारे जा रहे, सरकार बनाए किन्नरों की बटालियन और देखें फिर…

पॉलिटिकल फायदे के लिए सेना का इस्तेमाल करना शर्मनाक

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वाराणसी. सीमा पर जवान- जवान बच्चे मारे जा रहे हैं। 56 इंच की छाती को क्या हो गया? मां गंगा के पुत्र कहा है ? आज लहू लुहान जम्मू रो रहा है। गंगा माता रो रही है।बेटे को क्या हो गया ? सीमा पर कड़ी कर्रवाई क्यों नहीं की जा रही है। यह सवाल है किन्नर अखाड़ा की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का। उन्होंने यह सवाल सोमवार को वाराणसी के महमूरगंज स्थित गंगा महासभा के कार्यालय में मीडिया से मुखातिब होते हुए पूछे।


56 इंच की छाती तो क्या हो गया, जवान-जवान बच्चे मारे जा रहे, सरकार बनाए किन्नरों की बटालियन


उन्होंने कहा सरकार किन्नरों की बटालियन तैयार करें। हमें गम नहीं। हमारे पीछे कोई रोने वाला नहीं। समाज हमें प्रेम दे हम लड़ेंगे, सवाल के लहजे में कहा कि हमें दुख नहीं होता, जब जवान- जवान बच्चे सीमा पर मारे जा रहे। अब छप्पन इंच की छाती को क्या हो गया। गांगा के बेटे को क्या हो गया। आज लहू लुहान जम्मू रो रहा है। गांगा माता रो रही है।


सरकार एक बार हमें आजमा कर देखे


उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि जब लाल किले पर अंग्रेजों ने कब्जा करने लिए हमला बोला तो औरतों की इज्जत बचाने के लिए पांच सौ किन्नरों ने अपना बलिदान दिया था। हमें दुख है कि यह इतिहास कम ही किताबों में मिलता है। उन्होंने कहा इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है, जिनके पास पैसा और पावर है। आज तो लोग इतिहास भी चेंज करने में लगे हैं। लेकिन कभी भारत माता की आन, बान, शान के लिए किन्नर समाज को आवाज देंगे तो किन्नर तन, मन, धन, आत्मा, शरीर से सबसे आगे खड़ा रहेगा। आजमा कर तो देखो।

पॉलिटिकल फायदे के लिए सेना का इस्तेमाल करना शर्मनाक

 

आखिर में उन्होंने कहा कि सीमा पर आज जो हालात है इसके लिए पूर्व व वर्तमान की सरकार जिम्मेदार है। यह अपने फायदे के लिए कठोर कार्रवाई नहीं करते। हमारी सेना बहुत मजबूत और सक्षम भी। एक बार उनकों खुली छूट देके तो देखें। पॉलिटिकल फायदे के लिए सेना का इस्तेमाल करना शर्मनाक है। उन्होंने सभी सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वह शख्स ज्यादा जिम्मेदार है जो गद्दी पर बैठकर कड़े फैसले नहीं ले पाता।

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