
Middle से High School के बीच 10 हजार Students स्कूल भूले
विदिशा. राज्य और केंद्र सरकार Education पर Focus किए हुए है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अपने पसंद के Subjects का चुनने का पूरा अधिकार है, वहीं प्रदेश में CM Rise स्कूलों के नाम से सरकारी स्कूलों को भी प्रायवेट स्कूलों के बराबरी में लाकर खड़ा करने की तैयारी है। बच्चों को पुस्तकें, साइकिल, यूनीफार्म सब दिया जा रहा है, लेकिन फिर भी VIDISHA जिले के करीब 10 हजार बच्चे आठवीं से दसवीं के बीच School छोड़ बैठे हैं। और ये आंकड़ा सिर्फ एक वर्ष के बीच का है। शिक्षा विभाग के रिकार्ड में ये बच्चे अब स्कूल नहीं आते। जिले में ऐसे बच्चों की सबसे ज्यादा संख्या सिरोंज ब्लॉक में है। दरअसल आठवीं तक किसी को फेल न करने की नीति और नवीं में आते ही सीधे अपेक्षाकृत जटिल complex curriculum से सामना इसका मुख्य कारण माना जा रहा है।
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ब्लॉक कक्षा 8 कक्षा 9 अंतर
बासौदा 5667 4479 -1188
ग्यारसपुर 2204 1949 -255
कुरवाई 2809 2127 -682
लटेरी 3349 2054 -1295
नटेरन 3838 2601 -1237
सिरोंज 5622 3364 -2258
विदिशा 5963 5389 -574
कुल 29452 21963 -7489
(नोट- इनमें कक्षा 8 की संख्या वर्ष 2020-21 की तथा कक्षा 9 की संख्या 2021-22 की है।)
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ब्लॉक कक्षा 9 कक्षा 10 अंतर
बासौदा 4829 4474 -355
ग्यारसपुर 2313 2006 -307
कुरवाई 2362 2116 -246
लटेरी 2326 1927 -399
नटेरन 3045 2606 -439
सिरोंज 3864 3132 -732
विदिशा 5697 5472 -225
कुल 24436 21375 -3061
(नोट- इनमें कक्षा 9 की संख्या वर्ष 2020-21 की तथा कक्षा 10 की संख्या 2021-22 की है।)
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सिरोंज के 3088 बच्चों ने छोड़ा स्कूल
विदिशा जिले का सिरोंज ब्लॉक ऐसा है जहां सबसे ज्यादा बच्चों ने अधूरी पढ़ाई छोड़ स्कूल को अलविदा कहा है। इस ब्लॉक में कक्षा 8 वीं से 12 वीं के बीच 3088 बच्चों ने स्कूल छोड़ा है। जबकि पूरे जिले में इसी स्तर पर स्कूल छोडऩे वाले बच्चों की संख्या 10 हजार 931 है।
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सातवीं से आठवीं के बीच भी छोड़ रहे स्कूल
ऐसा नहीं कि बच्चे आठवीं के बाद ही स्कूल छोड़ रहे हैं। कक्षा 7 और 8 के बीच भी कई बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया है। जहां 2020-21 में कक्षा 7 में जिले में 30688 बच्चे सरकारी स्कूलों में दर्ज थी, वहीं पास होने के बाद भी कक्षा 8 में यह संख्या घटकर 30170 रह गई। यानी सातवीं के बाद 518 बच्चों ने आठवीं में प्रवेश ही नहीं लिया। इन बच्चों में सबसे ज्यादा 301 गंजबासोदा के और 224 सिरोंज ब्लॉक के हैं।
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आठवीं तक फेल न करने की नीति बनी दुखदाई
शिक्षाविदें की मानें तो सबसे ज्यादा शाला त्यागी बच्चे कक्षा 8 के बाद ही होते हैं। इसका मुख्य कारण है आठवीं तक फेल न करने की शासन की नीति। पहले पांचवीं-आठवीं बोर्ड परीक्षाएं होती थीं, जिसमें पास-फेल का डर होता था, शिक्षक को भी चिंता रहती थी अपने स्कूल के रिजल्ट की। लेकिन अब किसी को भी आठवीं तक फेल न करने की नीति के कारण पढ़े-लिखे बिना ही बच्चे नवीं तक पहुंच जाते हैँ। ऐसे में जब उनका नवीं कक्षा के अपेक्षाकृत कठिन कोर्स से सामना होता है तो उनके हाथ-पांव फूल जाते हैं और वे पढ़ाई छोड़ बैठते हैं। पहले आठवीं बोर्ड में वही बच्चे पास हो पाते थे जो वाकई थोड़ा बहुत ही सही, लेकिन पढऩा लिखना जानते थे। लेकिन अब वह स्थिति नहीं है और सीधे नवीं में आकर उन्हें जटिल पाठ्यक्रम से सामना करना होता है, यही कारण है कि नवीं का रिजल्ट भी 50 फीसदी तक नहीं पहुंच पाता।
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ये कारण हैं पढ़ाई अधूरी छोडऩे के
- आठवीं तक तो सभी पास हो जाते हैं, लेकिन नवीं में पहुंचते ही अपेक्षाकृत जटिल कोर्स का सामना करना पड़ता है।
्र-ग्रामीण क्षेत्र के कई बच्चे पढ़ाई अधूरी छोड़ जीविकोपार्जन में लग जाते हैं।
- आठवीं के बाद आते-आते बच्चे परिवार और खेती-मजदूरी के काम में लगने लगते हैं।
-ग्रामीण क्षेत्र में आज भी कई जगह दूर-दूर स्कूल हैं, ऐसे मेें पालक बच्चियों को स्कूल नहीं भेजते।
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हर माह पेट्रोल के लिए भी दिए थे 600 रुपए
शिक्षा विभाग की मानें तो लटेरी में अपेक्षाकृत ज्यादा दूर दूर स्कूल हैं, गांव से आने वाली छात्राओं को सुनसान रास्तों और जंगल से होकर भी गुजरना पड़ता है, ऐसे में कई पालक अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजते थे। इसलिए शासन से लटेरी क्षेत्र के करीब 500 पालकों को अपनी बेटियों को स्कूल लाने-ले जाने के लिए 600 रुपए प्रतिमाह पेट्रोल खर्च भी दिया गया था, जिससे छात्राएं अपने भाई, पिता या अन्य परिजनों के साथ बाइक से स्कूल आ-जा सकें।
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क्या कहते हैं डीइओ...
जिला शिक्षाधिकारी अतुल मुदगल इस बारे में बताते हैं कि सामान्यत: आठवीं तक बच्चे पढ़ाई नहीं छोड़ते, लेकिन आठवीं से नवीं तक आते ही बच्चे गायब हो जाते है। दरअसल आरटीइ के तहत हम आठवीं तक के बच्चों को तो जबरन स्कूल में प्रवेश दिला सकते हैं, लेकिन आठवीं के बाद ऐसा नहीं कर सकते। फिर कोविड में भी स्कूल न खुलने से कई बच्चों ने प्रवेश नहीं लिया था। खासकर बाहर से आने वाली छात्राओंं ने प्रवेश नहीं लिया। जिले के लटेरी-सिरोंज क्षेत्र में स्कूल अपेक्षाकृत दूर-दूर हैं, रास्ते में जंगल और काफी सुनसान रहता है, इसलिए पालक भी अपनी बेटियों को दूर स्कूल भेजने मेें हिचकते हैं। फिर भी हम प्रयास कर रहे हैं कि अब तो कोविड भी नहीं है, इसलिए शत प्रतिशत प्रवेश का लक्ष्य पूरा करें। संकुल स्तर पर और शाला स्तर पर भी शिक्षकों को ऐसे बच्चे तलाशकर उनके घर जाकर प्रवेश के लिए मनाने को कहा गया है।
Published on:
29 Apr 2022 10:42 pm
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