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VIDISHA…धरोहर को सहेज नहीं, उसके मुंह पर गंदगी उड़ेल रहे हम

एएसआई के स्मारकों पर पीने का पानी तक नहीं, राह में कृूड़े के ढेर और सड़क भी जर्जर

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धरोहर को सहेज नहीं, उसके मुंह पर गंदगी उड़ेल रहे हम

धरोहर को सहेज नहीं, उसके मुंह पर गंदगी उड़ेल रहे हम

विदिशा. पुरातत्व की दृष्टि से अकूत संपत्ति और विरासत को अपने में समेटे विदिशा जिला इतना समृद्ध है कि एक-दो दिन में सारा घूम भी नहीं पाएंगे। लेकिन सरकारी उदासीनता के दौर में संबंधित क्षेत्र के लोग भी अपनी धरोहर का मान नहीं रख पा रहे हैं। उसे सहेजना तो दूर अपनी धरोहर के मुंह पर गंदगी उड़ेलने से भी वे बाज नहीं आ रहे हैं। प्रशासन हर बैठक में विदिशा में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए प्रयासों का दम भरता है, लेकिन उसका दम बैठक से बाहर आते ही टूट जाता है। हालात यह हैं कि मालादेवी जैसे सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल और भारतीय पुरातत्व के स्मारक पर पर्यटकों को पीने का पानी तक नसीब नहीं होता। उन्हें हिंडोला तोरणद्वार और मालादेवी मंदिर तक पहुंचने के लिए भारी गंदगी के ढेरों के बीच और जर्जर सड़क से होकर गुजरना पड़ता है। चौथी शताब्दी की उदयगिरी गुफाओं का भी यही हाल है। इसकी फेसिंग से मवेशी बंध रहे हैं, गोबर के कंडे बनाए जा रहे हैं। गोबर और कचरे के ढेर लग रहे हैं। ऐसे मेँ बाहर से पर्यटक क्यों आएंगे? आएंगे भी तो उनके मन में विदिशा और यहां की धरोहर की कद्र को लेकर क्या तस्वीर बनेगी।

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उदयगिरी की फेंसिंग से बंध रहे मवेशी, थेपे जा रहे कंडे

जिला मुख्यालय से लगे हुए चौथी शताब्दी के बेहतरीन स्मारकों और पर्यटन स्थलों में से एक उदयगिरी का हाल बहुत बुरा है। जब मुख्य द्वार से प्रसिद्ध वराह गुफा की ओर जाते हैं तो उदयगिरी की फेंसिंग से मवेशी बंधे दिखते हैं। ट्रेक्टर-ट्रालियां खड़ी रहती हैं और गोबर तथा कचरे के ढेर लगे रहते हैं। यहां फेंसिंग से लगकर ही और उदयगिरी परिसर के अंदर भी कंडे थोपने का काम जारी है। पर्यटन विकास निगम ने यहां पेवर ब्लाॅक लगाकर फुटपाथ बनाया था, लेकिन उस पर भी मवेशियों को बंधे देखा जा सकता है। सांची आने वाले पर्यटक जब कभी यहां आते हैं तो हमारी धरोहर की इस कद्रदानी पर अपनी नाक भौंह सिकोड़ते हुए निकलते हैं।

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हिंडोला तोरण द्वार के सामने गंदगी का अंबार

ग्यारसपुर के भव्य हिंडोला तोरण द्वार में भगवान विष्णु के दशावतार के दर्शन होते हैं। यह दसवीं शताब्दी का स्मारक है जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। लेकिन ग्यारसपुर में तिराहे से उतरते ही चढ़ाई है और इस चढ़ाई के मार्ग से दस कदम आगे बढ़ते ही पर्यटकों का सामना ग्रामीणों द्वारा रोजाना सड़क किनारे और तोरणद्वार स्मारक के गेट के सामने तक उड़ेले जाने वाले कूड़ा करकट से होता है। अंदर भी कई वर्ष बीत जाने के बाद भी खंडहर को व्यविस्थत करने अथवा उसे बगीचे का रूप देने का प्रयास नहीं किया। यहां पीने के पानी का भी इंतजाम नहीं है।

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मालादेवी मंदिर की उखड़ी सड़क, पीने का पानी तक नहीं

जिले के सबसे खूबसूरत पुरा स्मारकों में से एक दसवीं शताब्दी के मालादेवी मंदिर ग्यारसपुर तक पहुंचने के लिए जो रास्ता है, वह जगह-जगह से उधड़ चुका है। पहले तो गंदगी के ढेर से निकल कर पर्यटक थोड़ा आगे पहुंचते हैं और फिर उनका सामना इस जर्जर सड़क से होता है। मंदिर परिसर में पहुंचकर मन तो आनंदित होता है, लेकिन यहां की उपेक्षा से मन खराब भी खूब होता है, जितनी खुशी और गर्व अपनी धरोहर को देखकर नहीं होता, उतना अफसोस इसकी उपेक्षा से होता है। पर्यटकों को इस मंदिर परिसर और आसपास कहीं पीने का दो घूंट पानी तक नसीब नहीं होता।