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बापू तेरा द्वार…यहीं हमारा डेरा, यहीं घर-परिवार

ये है बापू का द्वारा और उसमें बसे खानाबदोश परिवार

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बापू तेरा द्वार...यहीं हमारा डेरा, यहीं घर-परिवार

बापू तेरा द्वार...यहीं हमारा डेरा, यहीं घर-परिवार

विदिशा. वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाने रे....दुनिया से जाने के बाद भी महात्मा गांधी का ये प्रिय भजन खूब गाया जाता है और दुनियां माने या न माने पर बापू जरूर लोगों की पीर अब भी खूब जानते और जिसे पीर होती है उसे सहारा भी देते हैं। शायद यही कारण है कि पूरे विदिशा को छोडकऱ कुछ खानाबदोश परिवार करीब डेढ़ वर्ष से नीमताल पर बापू की शरण में हैं। गर्मी, बारिश और अब सर्दी भी उन्हें बापू की दर से डिगा नहीं पा रही। इन परिवारों के लिए बापू का ये द्वारा नहाने, कपड़े धोने, कंघी करने, गेंहू बीनने, चूल्हा जलाकर खाना पकाने, मुर्गियें पालने, बकरी को बांधने, बापू के सामने ही खिलौनों और गुब्बारों का छोटा सा व्यापार करने, बच्चों के खेलने से लेकर रात को सोने और सुरापान तक के लिए खूब काम आ रहा है। एक बापू ही हैं जो इन खानाबदोशों के परिवारों को शरण दिए हैं। वरना शहर में रैन बसेरे तक खाली पड़े रहते हैं। शहर में अतिक्रमण की भरमार है। जहां चाहे वहां झुग्गियां तो क्या बड़ी बड़ी इमारतें भी अतिक्रमण कर तान दी जाती हैं, लेकिन शायद बापू के जाने के बाद भी इन परिवारों को बापू की शरण सबसे ज्यादा सुरक्षित लगती है। सुबह गांधी सुमिरन मंच के लोग यहां नियमित आते हैं, वे बापू को नमन करते हैं, रोज गाते हैं सबको सन्मति दे भगवान...वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराए जाने रे..। इन्हीं परिवारों में से भी कुछ खड़े होकर गाते नहीं लेकिन मन ही मन सोचते हैं सच बापू का द्वारा सबसे न्यारा। यहां न प्रशासन आता है और न प्रशासन का डंडा। सबसे व्यस्ततम चौराहा, सब धर्मों, सब दलों और सब नेताओं की आस्था स्थली से ज्यादा मुफीद कौन सी आश्रय स्थली हो सकती है। बापू सबको शरण देते हैं, बिना भेदभाव के। जब बड़े पेट, झकाझक कपड़ों और लक्जरी कारों वाले यहां आकर हम अपना अधिकार मांगते के नारे लगाते हुए डेरा डाल लेते हैं तो बिना छत के अपने परिवार का गुजारा करने वाले ये खानाबदोशों को बापू कैसे रोक सकते हैं। प्रशासन के आला अधिकारी, जनप्रतिनिधि, नेता, समाजसेवी सब तो यहां से गुजरते हैं, बस...एक नजर डालकर चलते बनते हैं, क्योंकि ये बापू का द्वारा है। किसी को कहां फुर्सत की इस नेताओं, भामाशाहों, अतिक्रमणकारियों और सेवाभावियों के शहर में इन्हें आसरे के लिए एक जगह मुहैया करा सके। इसी लिए शायद गा नहीं पाते लेकिन सुबह-सुबह ये लोग भी बापू के आगे बुदबुदा जरूर लेते हैं कि-सबको सन्मति दे भगवान...।