
लुप्त होती हवेली संगीत परंपरा में प्राण फूंकता एक शिक्षक
विदिशा. वेदों में ध्वनित और ध्रुपद शैली पर आधारित संगीत जो पहले समाज गायन कहलाता था अब हवेली संगीत के नाम से मशहूर है। लेकिन इसे आगे बढ़ाने का काम ज्यादा नहीं हो सका, जिससे यह परंपरा अब खत्म होती जा रही है। विदिशा में एक शिक्षक अपने कुटुंबियोंं के साथ इस दुर्लभ संगीत परंपरा में प्राण फूंकने का काम कर रहे हैं। विशुद्ध रूप से ठाकुरजी और राधाजी को समर्पित यह संगीत मनोरंजन या लोकरंजन से कोसों दूर पूरी तरह भक्ति में सखी भाव का वाहक है।
नंदवाना निवासी मनमोहन शर्मा राधाजी के प्राचीन मंदिर के प्रमुख सेवक होने के साथ-साथ शासकीय शिक्षक भी हैं। राधाजी और ठाकुर जी की सेवा के साथ ही मनमोहन अक्सर हवेली संगीत और संगीत ग्रंथों में डूबे रहते हैं। मनमोहन बताते हैं कि हवेली संगीत मूलरूप से वेदोक््रत संगीत है। बृज की भाषा में इसे समाज गायन कहा जाता था, ध्रुपद शैली पर आधारित यह संगीत पूरी तरह ठाकुर जी, देशकाल और मौसम के अनुरूप होता है। इसमें राग रागिनियों के अनुरूप पदों का गायन होता है। मनमोहन बताते हैं कि वृंदावन में 550 वर्ष पूर्व राधावल्लभ संप्रदाय के अधिष्ठाता हरिवंश महाप्रभु ने हित 84 नामक ग्रंथ में पदों की रचना की और फिर स्वामी हरिदास ने इन्हें गाकर सखी परंपरा का गायन शुरू किया। लेकिन 1669 में जब मुगल सम्राट औरंगजेब ने सभी मंदिरों को नष्ट करने का फरमान जारी किया तो भक्तों, रसिकों और ठाकुर जी के सेवकों ने उनकी निधियां अपने घरों में छिपा लीं। बिना शिखर और बिना ध्वज के इन घर जैसे मंदिरों में जिनमें ठाकुरजी और राधाजी को विराजित किया गया, वे ही हवेली कहलाए और वहां गाए जाने वाले यही पद हवेली संगीत के नाम से प्रसिद्ध हुए।
शर्मा बताते हैं कि हवेली संगीत में यूं तो 64 वाद्य यंत्रों का उल्लेख है लेकिन न तो इतने वाद्ययंत्र बचे हैं और न उन्हें जानने और बजाने वाले। इसलिए अब मुख्य रूप से पखावज, बांसुरी, झांझ, हारमोनियम और ढप से ही हवेली संगीत सजता है। शर्मा के अनुसार हमारे परिवार में चंूकि पीढिय़ों से राधाजी की सेवा होती है, इसलिए हवेली संगीत भी हमें विरासत में ही मिला है। अब इसमें पत्नी अंजना, पुत्री राधिका और हितांशी पूरी शिद्दत से साथ देते हैं। कुटुंब के ही शशांक, शुभांग, अनुज और राजेंद्र भी हवेली संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाने में सहयेाग कर रहे हैं। लेकिन संगीतकारों का इस ओर ध्यान न होने से यह परंपरा खत्म होती जा रही है।
वे बताते हैं कि हवेली संगीत में 42 लीलाओं के ग्रंथों और मौसम के अनुरूप गायन होता है। गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्मी का अहसास दिलाने वाला संगीत होता है। इन ग्रंथों में वसंत से लेकर होली तक के हजारों पद हैं, जिनका एक विशेष अंदाज में गायन होता है। वे कहते हैं कि ये पद सखी भाव से गाए जाते हैं, हवेली संगीत भी सखी भाव से ही उपजा है। सखी भाव में पुरुष या स्त्री नहीं होता, वह तो सिर्फ सखी होता है, रसिक वही होगा जिसमें सखी भाव होगा। फिर राधाजी की सेवा तो सखी भाव से ही होती है, पुरुष भाव से तो राधारानी के सामने जा भी नहीं सकते।
Published on:
07 Dec 2020 06:44 pm
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