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विदिशा के प्रसिद्ध जिनालय….

महावीर जयंती पर विशेष

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विदिशा के प्रसिद्ध जिनालय....

विदिशा के प्रसिद्ध जिनालय....

Mahvee Jaayanti पर आज चौतफा उल्लास है। जियो और जीने दो का संदेश देने वाले भगवान महावीर चौबीसवें तीर्थंकर हुए हैं। विदिशा जिला प्राचीन संस्कृति के साथ ही धर्म और इतिहास को भी अपने में समेटे हुए है। जैन धर्म की भी यहां गहरी जड़ेें हैं। विदिशा को भगवान Sheetalnath के चार कल्याणकों से पवित्र नगरी माना जाता है। यहां मंदिरों में महावीर के भी जिनबिंब मौजूद हैं। बड़ोह के जैन मंदिरों की श्रंखला अपनी प्राचीनता खुद बताती है। यहां मौजूद चौबीसी, छोटे-छोटे द्वारों से प्रवेश करने पर अंधेरे कक्षों में विराजित तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाएं विस्मय में डाल देती हैं। इसी तरह विदिशा नगर में किले अंदर स्थित बड़े और छोटे दिगंबर मंदिर की प्राचीनता और भव्यता देखते ही बनती है। बड़ा जैन मंदिर तो करीब 800 वर्ष पुराना माना जाता है। इसके साथ ही अब विदिशा की ख्याति शीतलधाम में Acharyshri Vidhyasagar जी के आशीर्वाद से आकार ले रहे भव्य Samavsharan मंदिर और सिरोंज में नंदीश्वर जिनालय के रूप में भी चौतरफा फैलेगी।

सैंकड़ों तीर्थंकर प्रतिमाओं के साथ मुनि की भी प्रतिमा
जैन धर्म में तीर्थंकरों की प्रतिमाएं तो खूब मिलती हैं, लेकिन किसी मुनि की प्रतिमा का बनना और स्थापित किया जाना दुर्लभ ही है। विदिशा के श्री शीतलनाथ दिगंबर बड़ा जैन मंदिर में ऐसी ही एक प्रतिमा मौजूद है। यहां महाकीर्ति मुनि की काले पत्थर की बनी प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। प्रतिमा में मुनि अपनी पिच्छिका के साथ दोनों हाथ जोड़े नजर आते हैं। ऊपर तीर्थंकर भगवान की प्रतिमा मौजूद है। प्रतिमा पर अंकित लेख के आधार पर यह प्रतिमा 834 वर्ष पुरानी है।

मुगलों के हमले के हैं निशान
बड़ा जैन मंदिर समिति के अध्यक्ष मलूक चंद जैन बताते हैं कि यहां मौजूद भगवान पाŸवनाथ की प्रतिमा को मुगलकाल में आतातायियों ने तोडऩे का खूब प्रयास किया। भगवान की प्रतिमा पर प्रहार के निशान अब भी दिखाई देते हैं। मुगलों के आतंक से बचाने के लिए मंदिर की प्रतिमाओं को तलघर मेंं छिपा दिया गया था, यह तलघर अब सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया है।

रथ की आकृति का विशाल मंदिर
बड़े जैन मंदिर की विशालता और भव्यता रास्ता चलते नजर नहीं आती। लेकिन अंदर परिसर में प्रवेश करते ही बड़े रथ का आभास होता है, जो दो हाथियों द्वारा खींचा जा रहा है। मंदिर में नक्काशी बहुत खूबसूरत है। ऊपर चौबीसी बनाई गई है। यहां लकड़ी की गंधकुटी है, संगमरमर, पत्थर, अष्टधातु और पीतल की छोटी-बड़ी सैंकड़ों प्रतिमाएं मौजूद हैं।
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बड़ोह में सबसे प्राचीन जैन मंदिर और चौबीसी
विदिशा जिले में सबसे प्राचीन जैन मंदिर और चौबीसी बड़ोह में मौजूद है। यहां पत्थर खदानों के बीच स्थिल प्राचीन जैन मंदिर के शिखर दूर से ही आकर्षित करते हैं। अंदर परिसर में चौतरफा चौबीसी दिखाई देती है, जिनमें से कई में अब भी तीर्थंकर प्रतिमाएं मौजूद हैं, तो कई अब गायब या खंडित हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब मंदिर के बाहर से बहुत छोटे और अंधेरे दिखने वाले कमरों में अंदर जाने से तीर्थंकरों की खडग़ासन विशाल प्रतिमाएं मौजूद दिखती हैं। यहां की बनावट और शिल्प भी प्रभावी है। सदियों बाद भी ये मंदिर अब भी पूजे जाते हैं और सुरक्षित र्हैं।
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आचार्यश्री के सपनों का समवशरण ले रहा आकार
आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के विदिशा विहार से पहले ही उन्हें बर्रों में एक घर से मिली बड़े बाबा आदिनाथ जी की प्रतिमा मिलने का संदेश दिया गया था। तब आचार्यश्री ने प्रतिमा को विदिशा लाने को कहा था, प्रतिमा देखकर उन्हें अतिशयकारी बताया था। इसके बाद उसे मौजूदा शीतलधाम परिसर में स्थापित किया गया और फिर यहीं आचार्यश्री ने भव्य समवशरण के निर्माण का सपना संजोया। पूरा समाज एक हो गया और आचार्यश्री की भावना के अनुरूप अब यहां करोड़ों की लागत से भव्य समवशरण आकार ले रहा है।
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पांच सौ साल पुराने नसिया जी में अब त्रिमूर्ति और नंदीश्वर जिनालय
सिरों जके दिगंबर जैन तीर्थस्थल नसिया जी के पांच सौ साल पुराने इतिहास में अब त्रिमृूर्ति जिनालय और नंदीश्वर जिनालय भी शामिल हो रहा है। करीब 120 फीट बीघा क्षेत्र में फैले नसिया जी में 15-15 फीट ऊंची भव्य प्रतिमाएं मौजूद हैं। मंदिर का निर्माण चल रहा है। इस त्रिमूर्ति भवन में भगवान आदिनाथ, भरत और बाहुबलि की प्रतिमाएं दर्शन देंगी। इसके साथ ही नंदीश्वर जिनालय आकार लें रहा है जिसमें 52 जिनालय बनेंगे। पूर्व से ही यहां भगवान संभवन नाथ की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। मुनिश्री सुधासागर ने यहां बाहुबलि की प्रतिमा पहले से ही स्थापित करा दी थी। समिति के अध्यक्ष जिनेंद्र कुमार जैन और कोषाध्यक्ष विजय कुमार जैन बताते हैं कि यहां संवत 1272 में स्थापित चौबीसी मौजूद है।