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बालाजी की मूर्ति बड़ी बनी तो कहलाए बड़े बालाजी, फिर विराजे व्यंकटेश

नगर में बालाजी के ही दो मंदिर हैं, एक बड़े बालाजी का नंदवाना में, तो दूसरा मंदिर किलेअंदर में व्यंकटेश बालाजी का

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बालाजी की मूर्ति बड़ी बनी तो कहलाए बड़े बालाजी, फिर विराजे व्यंकटेश

बालाजी की मूर्ति बड़ी बनी तो कहलाए बड़े बालाजी, फिर विराजे व्यंकटेश

विदिशा. नगर में बालाजी के ही दो मंदिर हैं, एक बड़े बालाजी का नंदवाना में, तो दूसरा मंदिर किलेअंदर में व्यंकटेश बालाजी का। नंदवाना की प्रतिमा बड़ी लेकिन ठेठ देशी अंदाज की है, जिसमें बालाजी के सिर पर पत्तों का मुकुट बना है, जबकि व्यंकटेश बालाजी की प्रतिमा काले सालिगराम शिला की और दक्षिण भारतीय शैली का है। अनुमान है कि नंदवाना में ही कार्यशाला थी, जहां प्रतिमाओंं का निर्माण हुआ होगा।
नंदवाना स्थित बालाजी का मंदिर अपने वास्तु में तो भव्य है, लेकिन जगह की कमी होने के कारण उतना विस्तारित नहीं हो सका। बड़े बालाजी मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रमेश अग्रवाल बताते हैं कि ऐसा माना जाता है कि जब किले अंदर के बालाजी मंदिर के निर्माण के लिए आए कारीगरों ने मूर्ति निर्माण किया तो मूर्ति बड़ी बन गई, इससे पहले ही मंदिर का गर्भग्रह और द्वार निर्माण हो चुका था। नंदवाना में बन रही मूर्ति का उस द्वार में से जाना संभव नहीं था, इसलिए किलेअंदर के लिए नई मूर्ति बनी और नंदवाना में बन चुकी प्रतिमा को मोहल्ले के लोगों ने यहीं विराजित करा दिया। आकार में बड़ी होने के कारण बालाजी की यह प्रतिमा ही बड़े बालाजी कहलाई। बाद के वर्षोँ में मंदिर जब जीर्णशीर्ण हो चला तो मोहल्ले के धर्मप्रेमी लोगों और व्यापारियों ने ट्रस्टबनाकर उसे पहले से भी बेहतर रूप में ला खड़ा किया। इस ट्रस्ट में मनमोहन बंसल सहित अन्य रहवासी शामिल हैं। इसी मंदिर में हनुमान जी की मनोहारी प्रतिमा भी विराजित है।


कुछ अन्य लोगों का मानना है कि मंदिर निर्माण के कारीगर यहां रहते थे, वे पुॅर्सत में मंदिर निर्माण करते थे, यहां विराजित प्रतिमा इसी मंदिर के लिए ही बनाई गई थी, किले अंदर के व्यंकटेश बालाजी मंदिर के लिए तो अलग से ही मंगाई गई थी जो शालिगराम शिला की थी। लेकिन नंदवाना के मंदिर की मूर्ति बड़ी होने और पहले प्राण प्रतिष्ठा होने के कारण बड़े बालाजी के रूप में प्रतिष्ठापित हुई। मंदिर में भगवान विष्णु ही बालाजी हैं, जो देवी लक्ष्मी और भूदेवी के साथ विराजमान हैं। बड़े बालाजी के मंदिर का शिखर चरणतीर्थ मंदिरों की तरह है। मंदिर परिसर में ही कुआ है, यहां लोहांगी के पत्थरों को तराशकर मंदिर बनाया होगा।


किले अंदर के बालाजी मंदिर का निर्माण 250 वर्ष पूर्व हुआ जो वास्तुकला का अद्भुद नमूना है। ग्वालियर स्टेट के मुंशी प्रयागदास ने मंदिर बनवाने का संकल्प लिया था, लेकिन वे अपने जीवनकाल में इसे पूरा नहीं कर पाए। करीब 20 वर्ष में बने इस मंदिर का निर्माण उनकी पत्नी और पुत्र ने कराया। मंदिर बनने के बाद काले पत्थर से बने व्यंकटेश बालाजी के भगवान विष्णु, लक्ष्मी और भूदेवी की प्रतिमाएं तिरूपति बालाजी की परंपरा के अनुसार प्रतिष्ठापित की गर्इंं। दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुरूप प्रतिमा निर्माण होने के बावजूद मंदिर की पूजा उत्तरभारतीय पुष्टिमार्ग सेवा भावना से होती है। अष्टमयाम सेवा रोजाना होती है। मंदिर की सेवा के लिए 1716 में गुजरात से पं. देवीदास चतुर्वेदी पंडाजी को बुलाया गया था और पंडाजी को प्रयागदास मुंंशी की धर्मपत्नी ताम्रपत्र पर मंदिर देकर चली गईं थीं, तब से पंडाजी की 11 वीं पीढ़ी मंदिर की सेवा कर रही है।


प्रस्तुति-गोविंद देवलिया(इतिहासकार)विदिशा