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जो लोग जगन्नाथपुरी नहीं जा पाते, वे यहां जरूर आते हैं, होता है चमत्कार

जो लोग जगन्नाथपुरी नहीं जा पाते, वे यहां जरूर आते हैं, हर दिन होता है चमत्कार

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जो लोग जगन्नाथपुरी नहीं जा पाते, वे यहां जरूर आते हैं, होता है चमत्कार

(गोविन्द सक्सेना की रिपोर्ट)

विदिशा। जो श्रद्धालु चार धाम में से एक जगन्नाथपुरी नहीं जा पाते उनके लिए भगवान खुद दर्शन देने आते हैं। यहां भी रथयात्रा निकाली जाती है। महत्व भी जगन्नाथपुरी से कम नहीं है। इसीलिए तो यहां दर्शन करने वालों की संख्या दो लाख से अधिक होती है।

चारों धाम में से एक है उड़ीसा की जगन्नाथपुरी। आषाढ़ सुदी दूज पर यहां रथयात्रा और रथ में आरूढ़ भगवान जगदीश, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। भगवान खुद विदिशा जिले के छोटे से गांव मनोरा में आते हैं। यह दुर्लभ नजारा देखने के लिए दूर-दूर से दो लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंच जाते हैं।

यदि आप भी उड़ीसा की जगन्नाथपुरी में नहीं जा पा रहे हैं तो बना लीजिए विदिशा आने का प्लान। यहां के मानोरा गांव में भी आपको जगन्नाथ के पुरी का नजारा देखने को मिल जाएगा। इसके साथ ही रथ में आरूढ़ साक्षात जगदीश स्वामी के दर्शन करने का का भी दुर्लभ संयोग आपको मिलेगा। यहां भगवान जगदीश स्वामी का प्राचीन मंदिर है, जिसमें जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के श्रीविग्रह विराजमान हैं।

भक्त को दिया वचन निभाने आते हैं भगवान
मंदिर ट्रस्ट के ट्रस्टी रामनाथ सिंह बताते हैं कि यह मंदिर भगवान के भक्त और मानौरा के तरफदार मानिकचंद और देवी पद्मावती की आस्था का प्रतीक है। तरफदार दंपत्ति भगवान के दर्शन की आकांक्षा में दंडवत करते हुए जगन्नाथपुरी चल पड़े थे। दुर्गम रास्तों के कारण दोनों के शरीर लहुलुहान हो गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इस पर भगवान स्वयं प्रकट हुए और उनको मानोरा में ही हर वर्ष दर्शन देने आने का वचन दिया। अपने भक्त को दिए इसी वचन को निभाने हर वर्ष भगवान आषाढ़ी दूज को रथयात्रा के दिन मानोरा पधारते हैं और रथ में सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं। 200 सालों से यह परंपरा चली आ रही है।

भगवान मानोरा पधार गए...
मंदिर के मुख्य पुजारी भगवती दास बताते हैं कि रथयात्रा की पूर्व संध्या को आरती, भोग लगाने के बाद जब रात्रि को भगवान को शयन कराते हैं, तो उनके पट पूरी तरह से बंद किए जाते हैं, लेकिन सुबह अपने आप थोड़ा-सा पट खुला मिलता है। जब रथ पर भगवान को सवार कराया जाता है तो अपने आप उसमें कंपन होता है अथवा वह खुद ही लुढ़कने लगता है। यही प्रतीक है कि भगवान मानोरा आ गए हैं। मुख्य पुजारी के मुताबिक उड़ीसा की पुरी में भी पंडा रथयात्रा के दौरान जब वहां भगवान का रथ ठिठककर रुकता है तो घोषणा करते हैं कि भगवान मानोरा पधार गए हैं।

भगवान को लगता है मीठे भात का भोग
रथयात्रा के दिन भगवान जगदीश को पूरी पवित्रता के साथ बनाए गए मीठे भात का भोग लगाया जाता है। कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर भी भगवान को ये भोग अर्पित कराते हैं। इस भोग को अटका कहा जाता है। यह मिट्टी की हंडियों में मुख्य पुजारी द्वारा ही तैयार किया जाता है। जिसे भगवान को अर्पित करने के बाद भक्तों में बांटा जाता है। इसी लिए कहा जाता है कि जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ।

तन की सुधि नहीं, मन जगदीश के हवाले
भगवान के दर्शन करने बड़ी संख्या में लोग मीलों दूर से दण्डवत करते हुए मानोरा पहुंचते हैं। रास्ता चाहे जितना दुर्गम, पथरीला, कीचड़ भरा या सड़कें गड्ढे और गिट्टियों वाली हों, भक्तों की आस्था कम नहीं होती। एक दिन पहले से दंडवत करते लोग यहां पहुंचते हैं और रास्ते भर जय जगदीश हरे की टेर लगाते जाते हैं। सच उन्हें ऐसे में अपने तन की भी सुध नहीं रहती कि कहीं शरीर छिल रहा है, कहीं चोट लग रही है, कहीं वे कीचड़ में लथपथ हैं, बस एक ही धुन रहती है जगदीश स्वामी के दर्शन की।

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