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Jain Samaj-आसान नहीं है जैन साधु बनने की डगर, हिला देगी त्याग की ये दास्तां

स्वरूप बदलते ही बदले रिश्ते, पिता ने छुए गृहस्थ जीवन के पुत्र के पैर

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Jain Samaj-आसान नहीं है जैन साधु बनने की डगर, हिला देगी आपको ये दास्तां

Jain Samaj-आसान नहीं है जैन साधु बनने की डगर, हिला देगी आपको ये दास्तां

विदिशा. कुंडलपुर में रविवार को क्षुल्लक दीक्षा के बाद विदिशा के मयूर जैन को मिला क्षुल्लक कैवल्यसागर नाम। दीक्षा के दिन ब्रम्हचारी मयूर भैया ने निर्जला व्रत रखा। केश लोंच किए और फिर आचार्यश्री ने उन्हें दीक्षा प्रदान कर कमंडल प्रदान किया। सोमवार को कैवल्यसागर की पहली आहारचर्या परंपरानुसार उनके गृहस्थ जीवन के माता-पिता के पास हुई। अपने बेटे को दुलारने वाली मां माया जैन आज उन्हें साधु वेश में देख समझ नहीं पा रहीं थीं कि वे दुखी हों या खुश। इकलौता बेटा वैरागी हो गया था। लेकिन दिल पक्का किया और उन्हें आहार दिया। उधर वह क्षण भी आया जब गृहस्थ जीवन के पिता मुकेश जैन ने उन साधु के पैर भी छुए जो अब उनके बेटे नहीं मोक्षमार्गी हो गए थे। मन ही मन में मां की ममता रो रही थी, लेकिन फिर भी मोक्षमार्गी की मां बोलीं- धन्य हो गई मेरी कोख, पहले मैं ही भोजन कराती थी, अब दुनियां की हर मां उन्हें भोजन कराने लालायित रहेगी।

अमेरिका जाते-जाते गुरु चरणों में पहुंच गए
क्षुल्लक कैवल्य सागर के गृहस्थ जीवन के पिता बड़ा घर वाले मुकेश जैन ने बताया कि हमारे घर शुरू से साधुओं का आना-जाना है, उनकी आहारचर्या भी खूब हुई है। संस्कार शुरू से थे, वही मनी(मयूर जैन)ने भी देखे। उनके मस्तिष्क पर इन्हीं सबका असर हुआ, भोपाल में कोचिंग के दौरान भी वे मुनियों के पास जा पहुंचे थे। तब समझा बुझाकर उन्हें लाए थे। 2019 में एमटेक किया और फिर अमेरिका जाने की तैयारी थी, पासपोर्ट भी बन गया था, लेकिन कोरोना की बंदिशों के कारण वहां नहीं जा पाए और गुरू चरणों में पहुंच गए। इंदौर में जुलाई 2020 तके आचार्यश्री विद्यासागर महाराज से आजीवन ब्रम्हचर्य व्रत लिया और फिर उन्हीं के निर्देश पर 25 जुलाई को निर्यापक मुनि समयसागर के पास चले गए और फिर उन्हीं के होकर रह गए।

अभाव या मजबूरी में नहीं, मन से होता है वैराग्य
मुकेश कहते हैं कि ये हमारे पुण्यों का प्रताप है। हमारे बेटे ने तलवार की धार पर चलने और अपने कल्याण का मार्ग चुना है। मां की कोख धन्य हो गई। हमें पहले से संभावना थी कि सबकुछ होने के बावजूद इन्हें रोक पाना संभव नहीं है। दरसअल वैराग्य पथ पर चलने का निर्णय किसी मजबूरी या अभावग्रस्त जीवन के कारण नहीं लिया जाता। संपन्नता और समृद्धि के बावजूद मन में ही वैराग्य के अंकुर पनपते हैं और धन, संपत्ति, रिश्ते-नाते, शौहरत मोक्षमार्गी को कुछ नहीं भाता। वह सबको ठोकर मारकर वैराग्य की ओर मुड़ जाता है, ऐसा ही यहां भी हुआ।

पहला आहार गृहस्थ जीवन के माता-पिता के पास
दीक्षा के बाद परंपरा है कि पहली आहारचर्या साधु के गृहस्थ जीवन के माता-पिता और परिजन कराते हैं। यह सबसे कठिन क्षण था। गृहस्थ जीवन के पुत्र मयूर साधु वेश में आहार लेने मुकेश जैन-माया जैन के पास पहुंचे। माता-पिता के लिए यह बहुत कठिन था। लेकिन दोनों ने दिल पक्का किया, कैवल्यसागर को आहार दिया, आजीवन ब्रम्हचर्य व्रत के कारण माया जैन उन्हें छू नहीं सकीं, मुकेश जैन ने उनके पैर छुए, यह दृश्य काफी भावुक कर देने वाला था। लेकिन पूरे परिवार के लिए यह भाग्योदय जैसा भी था, इसलिए मन के भावों को किसी ने उजागर न होकर खुशी खुशी साधु कैवल्यसागर की आहारचर्या में हिस्सा लिया।

मां की ममता रोई तो दिल में महाभाग्य का गर्व भी उमड़ा
कैवल्यसागर के गृहस्थ जीवन की मां माया जैन अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहीं थीं। कभी वे खुशी से चहक उठतीं तो कभी मां की ममता के कारण उनका गला भर आता। वे बोलीं- बहुत रोई मैं, खूब कहा था रूक जाओ, लेकिन वैराग्यपथ पर चलने वाले तो निर्माेही हो जाते हैं। मेरी हालत भी बिगड़ गई थी, खूब समझाया था, लेकिन जब उनका पक्का मन देख लिया तो हमने भी सहमति दे दी। जब पहले दिन वह आहारचर्या के लिए घर आए तो बहुत भावुकता के पल थे। लेकिन दिल कह रहा था कि ये महाभाग्य है, गर्व का क्षण है। आज तक मैं ही अपने बेटे को भोजन देती थी, आज हजारों माताएं उन्हें एक ग्रास देने के लिए लालायित रहेंगी।

बड़ा घर में है साधुओं की परंपरा
बड़ा घर परिवार से जुड़े प्रो. धर्मेश जैन बताते हैं कि हमारा परिवार तीन पीढिय़ों से साधु परंपरा से जुड़ा है। पहले केसरबाई जैन सात प्रतिमाधारी थीं। फिर हमारी सगी बहन बाल ब्रम्हचारी राखी को 2006 में आचार्यश्री विद्यासागर जी ने आर्यिका दीक्षा दी। मां की भी संल्लेखना हुई और उस समय मुनि अजीतसागर ने सात प्रतिमा धारण कराकर उन्हें श्रद्धाश्री नाम दिया था। अब इसके बाद मुकेश जैन के पुत्र और धर्मेश जैन के भतीजे मयूर को क्षुल्लक दीक्षा प्रदान की गई है।