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काशी के विद्वानों पर सिरोंज की हुई तीन विजय की खुशी में मनता है उत्सव

निराकार और साकार ब्रम्ह के सवाल-जवाबों में फड़ साहित्य के कलगी तुर्रा

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काशी के विद्वानों पर सिरोंज की हुई तीन विजय की खुशी में मनता है उत्सव

काशी के विद्वानों पर सिरोंज की हुई तीन विजय की खुशी में मनता है उत्सव

विदिशा. वाक्या करीब 300 वर्ष पुराना माना जाता है, लेकिन जीत का असर और खुशी ऐसी थी कि आज भी उसका उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। यह खुशी थी शास्त्रार्थ में काशी के पंडितों पर सिरोंज के विद्वानों की लगातार तीन बार जीत की। कलगी और तुर्रा प्रतीक हैं दो पक्षों के। लेकिन ये पूरा मामला साहित्य से जुड़ा है, साहित्य भी ऐसा जिसे फड़ साहित्य माना जाता है। फड़ साहित्य यानी जिसे जमीन(फड़)पर बैठकर कहा और सुना जाए। दरअसल यह निराकार और साकार ब्रम्ह के स्वरूपों की ज्ञान और विनोदपूर्ण चर्चा होती है, जिसे ख्याल के रूप में गूढ़ तो कभी ठिठौली वाली शब्दावली के साथ गाया जाता है।

लगातार तीन बार जीत का है उत्सव
सिरोंज के बुजुर्ग बताते हैं कि होली की दूज को यहां विजय निशानो ंको निकालने की परंपरा है। दरअसल काशी के विद्वानों को सिरोंज के विद्वानों ने लगातार तीन बार शास्त्रार्थ में पराजित किया था। इसमें से पहली बार सिरोंज के रावजीपुरा के तिवारी परिवार, दूसरी बार पचकुंइया के शुक्ल परिवार और तीसरी बार गणेश की अथाई के ज्योतिषि परिवार ने काशी के विद्वानों को पराजित किया था। इनके तीन विजय निशान अब भी यहां निकलते हैं, लेकिन काशी के विद्वानों का चौथा निशान भी सिरोंज के विद्वानों ने जीत स्वरूप रख लिया था जो हरिपुर से निकलता है। दरअसल दूज पर निकलने वाला यह कलगी-तुर्रा उत्सव उसी शास्त्रार्थ में जीत की स्मृति में निकाला जाता है। यह क्षेत्र की गौरवशाली और ज्ञानमयी परंपरा का भी प्रतीक है।


ढप पर बांधे जाते हैं कलगी और तुर्रा
कलगी और तुर्रा वही हैं जो राजा-महाराजाओं की पगड़ी पर सजते हैं। लेकिन ज्ञान और साहित्य की इस परंपरा में इन्हें ढप पर बांधा जाता है। एक ढप पर बांधा जाने वाला पीला निशान तुर्रा कहलाता है, जबकि दूसरी ढप पर बांधा जाने वाला हरा निशान कलगी होता है।

ब्रम्ह के स्वरूप हैं ये निशान
बुजुर्ग बताते हैं कि इन निशानों में तुर्रा निराकार ब्रम्ह के स्वरूप में जाना जाता है और उसके साहित्य में निराकार ब्रम्ह के ही दर्शन होते हैं, जबकि कलगी साकार ब्रम्ह का प्रतीक है और। होली के विशेष मौके पर ये प्रतीक ससम्मान निकाले जाते हं, जिसमें अब ज्योतिषि परिवार के पं. नलिनीकांत, लक्ष्मीकांत और उमाकांत शर्मा सहित नगर के विद्वतजन भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

लिखे गए हैं कलगी-तुर्रा पर शोध ग्रंथ
कलगी-तुर्रा की रचनाएं ख्याल के अंदाज में सवाल-जवाब के रूप में होती हैं। यानी एक पक्ष अपनी रचनाओं के माध्यम से सवाल करता है तो दूसरा पक्ष रचनाओं के माध्यम से ही उसका जवाब भी देता है। कई बार इनकी शब्दावली बड़ी गूढ़ होती हैं तो कई बार देशी अंदाज में हास्यपूर्ण भी। बताया जाता है कि फड़ साहित्य के रूप में प्रचलित इन रचनाओं पर कई शोधगं्रथ लिखे जा चुके हैं।