
Kavita Poem Simran Jatav Vidisha
बेपरवाह हवाओं में उडऩे वाली बंदिश हूं मैं,
जड़ों में सिमटी खवाहिश हूं मैं।
गालिब की शायरी का मतलब हूं मैं,
शून्य से गुणा होता हुआ अरब हूं मैं।
पतंग और मांझे के बीच की कसक हूं मैं,
पितृसज्जा की सजावट में विलीन रौद्र रस हूं मैं।
भीड़ में गुम हो जाने वाला बादल हूं मैं,
मृगतृष्णा के अस्तित्व का अनादर हूं मैं।
जाड़े के मौँसम में खफा बर्फ हूं मैं,
पुश्तैनी पराया घर हूं मैं।
घडिय़ों की सुइयों से आंख मिचौली करता वक्त हूं मैं,
हर पत्थर में भगवान ढूंढने वाला भक्त हूं मैं।
उम्मीद के बीज से उगाया हुआ सपना हूं मैं
सुनसान चौराहे पर मिल जाने वाला अपना हूं मैं।
-सिमरन सिंह , गांधीनगर विदिशा
(पत्रिका नवोदित कविता लेखकों को प्रोत्साहित कर रहा है। इसके लिए उनकी रचनाएं मामूली सुधार के साथ प्रस्तुत की गई हैं। लेखक की यह रचना पूर्णत मौलिक है। अगर आप भी विदिशा जिले के निवासी हैं तो अपनी रचना हमें मोबाइल नंबर 8871122305 पर भेज सकते हैं।)
Updated on:
02 Sept 2020 08:49 pm
Published on:
02 Sept 2020 07:12 pm
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