
सरकारी अस्पताल: किराए से लेना पड़ते हैं प्रसूताओं को चादर-कंबल
विदिशा/ लटेरी. स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर तमाम योजनाएं, अनाप-शनाप खर्च और हमेशा बेहतर व्यवस्थाओं और मरीजों को राहत देने के दावे। खासकर प्रसूताओं को तो और भी ज्यादा सहूलियत का तुर्रा। लेकिन हकीकत देखना हो तो किसी दूरस्थ अंचल के सरकारी अस्पताल का दौरा कर लें। लटेरी का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र 30 पलंग वाला ऐसा अजूबा सरकारी अस्पताल है, जहां प्रसूताओं को चादर, तकिया और कंबल नहीं मिलता। परेशान परिजन अपने घर-गांव से कंबल और खाद की बोरियों से बनी दरी लेकर आते हैं, जो पलंग पर बिछाने और ओढऩे के काम आती है। जो लोग सरकारी अस्पताल में ये सुविधा तो मिलेगी, सोचकर सीधे अस्पताल आ जाते हैं, उन्हें बाजार के टेंट हाउस से चादर-कंबल किराए पर लेना पड़ता है। तीन-तीन दिन से भर्ती प्रसूताओं ने अपना सच पत्रिका को बताया, लेकिन बीएमओ का तुर्रा यह है कि धुलने गए होंगे चादर-कंबल इसलिए नहीं मिले होंगे।
लटेरी सामुदायिक स्वास्थ्य केेंद्र में इस तरह की शिकायत काफी दिनों से आ रही थी, जब पत्रिका ने इसकी पड़ताल की तो पता चला कि पुरुष वार्ड में कोई भर्ती नहीं था। लेकिन महिला वार्ड में करीब 10 प्रसूताएं भर्ती थीं। किसी के भी पलंग पर अस्पताल की चादर नहीं थीं, किसी के पास सरकारी कंबल नजर नहीं आ रहा था। किसी के पलंग पर घर से लाई चादर थी, तो किसी के पास खाद की बोरियों से बनी दरी बिछी थी। यहां प्रसव के लिए आईं ईसरवार की मोहरबाई महराज सिंह ने बताया कि 26 को भर्ती हुईं थीं, 28 को भी यहां न तो चादर मिला और न ही कंबल। वे अपने नवजात शिशु को लेकर पलंग पर खाद की बोरियों से बनी दरी बिछाकर लेटी थीं। उनकी सास का कहना था कि कंबल घर से लाए हैं, नहीं तो टेंट से किराए से लेना पड़ते हैं।
ईसागढ़ की क्रांति अहिरवार भी खाद की बोरियों से बनी दरी पलंग पर बिछाकर लेटीं थीं। उन्होंने बताया कि वे भी 26 फरवरी को यहां भर्ती हुईं हैं, लेकिन न कंबल मिला, न चादर और न तकिया। घर से जो लेकर आए थे, उसी से गुजारा कर रहे हैँं। चैनपुरा की नेहा के पलंग पर भी चादर-कंबल नहीं था, उन्होंने बताया कि अस्पताल से कुछ नहीं मिला। धन्नूबरखेड़ा की विनीता का भी यही हाल था। उधर स्टॉफ नर्स का कहना था कि महीने में करीब 150 महिलाओं का प्रसव यहां होता है।
ऑपरेशन थिएटर है, लेकिन उपयोग नहीं
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ऑपरेशन थिएटर है, लेकिन उसमें ताला ही जड़ा रहता है। कभी कभार कोई लेप्रोस्कोपिक शिविर जब होता है तो इसका उपयोग होता है, अन्यथा बंद ही रहता है। इस बारे में बीएमओ सुरेंद्र धाकड़ कहते हैं कि यहां कोई विशेषज्ञ ही नहीं तो ऑपरेशन थिएटर में कैसे काम होगा।
छतों से गिर रहा प्लास्टर, निकल रहे सरिए
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र होने के कारण लटेरी नगर ही नहीं, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी मरीज और उनके परिजन यहां आते हैं। लेकिन अस्पताल भवन का प्लास्टर कई जगह से गिर रहा है, सरिए निकल रहे हैं। ऐसे में आते-जाते या बैठे मरीजों या परिजनों पर प्लास्टर अथवा मलबा गिर सकता है। बीएमओ डॉ धाकड़ इस बारे में कहते हैं कि सबको पता है, कलेक्टर खुद आकर देख चुके हैं। लिख कर भी दे चुके हैं। इससे ज्यादा क्या कर सकते हैं।
अस्पताल के सभी चादर-कंबल एक साथ धुलने गए ?
लटेरी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 30 पलंग हैं, धुलने जाते हैंं तो उनके विकल्प के रूप में और चादर-कंबल भी होते हैं। हर अस्पताल में होते हैं। लेकिन यहां के बीएमओ का कहना है कि चादर-कंबल आनंदपुर धुलने जाते हैं, इसलिए नहीं मिल पाए होंगे। जब उनसे कहा गया कि तीन दिन से भर्ती महिलाओं को भी नहीं दिए गए तो उनका जवाब मिलता है कि ऐसा है तो मैं देखता हूं। अब बीएमओ साहब को कौन बताए कि यह छोटा सा मात्र 30 बिस्तर का अस्पताल है, केवल 10-15 महिलाएं ही भर्ती होती हैं। अस्पताल परिसर में ही आपका निवास भी है और ऑफिस भी, फिर भी क्या वाकई आपको नहीं पता कि यहां प्रसूताओं के लिए घर से और किराए से चादर-कंबल लाने पड़ते हैं।
कुपोषित बच्चों के लिए कोई इंतजाम नहीं
लटेरी स्वास्थ्य केंद्र में वर्षों से पोषण पुनर्वास केंद्र बना हुआ है, लेकिन यहां कोई बच्चा न तो भर्ती होता है और न ही उसके उपचार या उसके रखरखाव का कोई इंतजाम है। बताया गया है कि यहां पुनर्वास केंद्र के लिए कोई स्टॉफ ही नहीं है। जबकि लटेरी क्षेत्र सबसे ज्यादा पिछड़़े और ग्रामीण क्षेत्रों में शुमार माना जाता है।
इन बिन्दुओं की जांच तो जरूरी है....
- अस्पताल में कितने चादर-कंबल, तकिए हैं?
- कितने दिन में धुलने जाते हैं, एक साथ कितने जाते हैं?
-क्या एक बार में पूरे चादर-कंबल धुलने जाते हैं? स्टॉक में कुछ नहीं रहता। --हर माह कितने कपड़े धुलने का खर्च निकाला जाता है?
-यदि स्टॉक में चादर-कंबल रहते हैं तो 10 में से किसी भी प्रसूता को क्यों नहीं दिया गया?
- यदि दिया गया है तो किसी भी पलंग पर चादर, तकिया और कंबल क्यों नहीं दिखता?
- अगर बीएमओ और व्यवस्थाएं सही हैं तो क्या सभी प्रसूताएं और उनके परिजन झूठ बोल रहे हैं।
वर्जन..
अस्पताल में प्रसूओं को चादर-कंबल दिए जाते हैं। सभी चादर-कंबल आनंदपुर धुलने जाते हैं, एक दिन छोडकऱ आते हैं, तब बंटते हैं। अगर तीन दिन से नहीं दिए गए हैं तो मैं देखता हूं।
-डॉ सुरेंद्र धाकड़, बीएमओ, लटेरी
Published on:
01 Mar 2022 09:28 pm
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