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अलीगढ़ में पहाड़ी पर खत्म हो रही सेंगरराज की निशानियां

सिरोंज-लटेरी के आसपास का यह क्षेत्र अतीत में सेंगरराज के नाम से जाना जाता था  

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अलीगढ़ में पहाड़ी पर खत्म हो रही सेंगरराज की निशानियां

अलीगढ़ में पहाड़ी पर खत्म हो रही सेंगरराज की निशानियां

विदिशा. जिला मुख्यालय से करीब 120 किमी दूर अलीगढ़ कोटरा के नाम से पुराना गांव है। यह क्षेत्र लटेरी तहसील का हिस्सा है और सिरोंज-लटेरी के आसपास का यह क्षेत्र अतीत में सेंगरराज के नाम से जाना जाता था। बाद में इन स्थानों पर मुगलों की राज रहा और इस गांव का नाम अलीगढ़ हो गया। पहाड़ी पर जो गढ़ी थी, उसमें कभी सेंगर राजपूत रहा करते थे, उस पर मुगलों का कब्जा हो गया। लेकिन वह दौर बीते भी सदियां बीत गईं। पूरा गांव अब भी अलीगढ़ कोटरा के नाम से जाना जाता है, लेकिन यहां मुस्लिम समाज का केवल एक परिवार है और राजपूत तथा गुर्जरों का बाहुल्य। पहाड़ी पर गढ़ी खत्म सी हो गई है, उसके अवशेष जरूर अब भी हैें। गढ़ी का परकोटा, चहारदीवारी और तलघर की ओर जाने वाली सीढिय़ां अभी मौजूद हैं। यहां देखकर-खंडहर बता रहे हैं इमारत कभी बुलंद थी..की पंक्तियां बरबस ही याद हो आती हैं।
लटेरी तहसील का गांव अलीगढ़ कोटरा लटेरी नगर से मात्र 13 किमी दूर है। राजपूत और गुर्जर समाज के बाहुल्य वाली यह बस्ती नीचे बसी है और पहाड़ी पर पुरानी गढ़ी, पुराने बरगद के पेड़ और फिर बाद में बनाए गए हनुमान मंदिर स्थित है। इस गांव के नाम से स्वत: प्रमाणित है कि यह मुगलों द्वारा बसाया गांव है। लेकिन ग्रामीणों की मानें तो अब यहां केवल एक मुस्लिम परिवार रहता है। बुजुर्ग बताते हैं कि सिरोंज की ही तरह यहां भी सेंगर राजपूतों का राज था, उन्हीं के समय यहां पहाड़ी पर गढ़ी बनाई गई थी, यह गढ़़ी करीब 600 वर्ष पुरानी बताई जाती है। कालांतर में मुगलों ने सेंगर राजपूतों से ये गढ़ी छीन ली और अपना कब्जा जमा लिया। तभी से इस क्षेत्र को अलीगढ़ कोटरा कहा जाने लगा। इस बात को भी सदियां बीत गईं और मुगलकाल भी बीत गया। लेकिन पहाड़ी पर बनी गढ़ी काफी अर्से तक अपना वैभव बताती रही। लेकिन रख रखाव न हो तो भव्य और मजबूत इमारतें भी ढह जाया करती हैं, ऐसा ही इस गढ़ी के साथ भी हुआ। गढ़ी लगभग पूरी ढह चुकी है। बची हैं तो यहां की चहारदीवारी का कुछ हिस्सा, बुर्ज का एक हिस्सा, नीचे तलघर की ओर जाती सीढिय़ां और गढ़ी की कुछ जीर्णशीर्ण सी दीवारें।

खजाने की खोज में भी मिटी है गढ़ी
अलीगढ़ कोटरा निवासी प्रेमसिंह राजपूत, जितेंद्र राजपूत और दयाल सिंह गुर्जर बताते हैं कि कुछ समय की मार से तो कुछ लोगों में खजाने की भूख के कारण भी यह गढ़ी खत्म हुई है। लोगों ने खजाने की खोज में इसे कई जगह खोदने और तोडऩे का प्रयास किया। ग्रामीणों ने यहां पुख्ता दीवारें, परकोटे और सीढिय़ां खूब देखी हैं। यहां तहखाने और सुरंगे भी थीं। मजबूत पत्थर और पुरानी ईंटों के अवशेष अभी भी यहां मौजूद हैं। बरगद का पुराना पेड़ भी गढ़ी के पास ही मौजूद है, जिसमें गढ़ी के कई पत्थर और हिस्से समां चुके हैं।