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कैसे कहूं तू निर्मल-पावन है मां, तेरा जल तो…

तेरी दशा देखकर रोना आता है, अब हम हार गए

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कैसे कहूं तू निर्मल-पावन है मां, तेरा जल तो...

कैसे कहूं तू निर्मल-पावन है मां, तेरा जल तो...

विदिशा. बेत्रवती मां, तू तो युगों युगों से यहां बह रही है, लेकिन अब कैसे कहूं कि वाकई तू पावन है, कैसे कहूं तेरा जल निर्मल है। कैसे इससे खुद स्नान करूं और कैसे इसे कलश में भरकर देवताओं का जलाभिषेक करूं। तू तो पापमोचिनी और कलयुग की गंगा कहलाती है। मां, क्या ऐसी ही होती है गंगा? तेरे नाम का जाप तो देवता भी करते हैं, फिर हम मनुष्य कैसे तेरा ही पानी पी पीकर तुझसे ही मुंह मोड़ते गए। तू पतित पावनी थी, हमने पूरे शहर का गटर तेरे आंचल में उड़ेलकर तुझे गंदगी से सराबोर कर दिया। ऐसा करने वाले दोषी हममें से ही हैं मां। लेकिन क्या तू उन्हें माफ कर देगी। तेरे नाम लेकर शौहरत और दौलत की सीढिय़ां चढऩे वाले क्या वाकई सुखी रह पाएंगे। मां, तेरी ये हालत असहनीय है। लेकिन शहर के ज्यादातर लोग सिर्फ तेरा हाल देखकर दुखी हो सकते हैं। उनमें इतना सामथ्र्य नहीं कि वे तेरा आंचल संवारने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास कर सकें। तेरी दुर्दशा के जिम्मेदार हम वे सब लोग भी हैं जो चिंता तो करते हैं, गाल तो बजाते हैं, लेकिन तुझे इस संकट से मुक्त करने का माद्दा हममें नहीं दिखता।
मां, ऐसे लोगों को सामथ्र्य दे और उन्हें सजा भी जिन्होंने तेरे उपकारों को सामथ्र्य होने के बाद भी भुला दिया। तेरी दशा देखकर रोना आता है, अब हम हार गए, तू ही कुछ कर सके तो कर मां या करें वे देवी-देवता जो तेरे घाट पर विराजमान होकर देख रहे हैं दुर्दशा और पापियों के पाप भी।