
मुझसे बड़ा मेरा देश, इसलिए समर्पित किए दोनों बच्चे- साधना पांडेय
विदिशा. आसान नहीं होता अपने दोनों बच्चों को अपने से दूर सेना जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए भेजना। और जब बेटी को भेजना हो तो फिर यह और भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि आज की कोई भी मां अपने बच्चों की उड़ान को नहीं रोकना चाहती। मेरे मन में भी आया था कि दोनों बच्चे सेना में जा रहे हैं, हम एकाकी हो जाएंगे, बच्चे कैसे चुनौतियों का सामना करेंगे, लेकिन फिर बच्चों का जोश और उनके सपने देखे तो खुद के दर्द को अपने में ही समेट कर बच्चों को सेना के लिए रवाना किया। तभी मेरे मन में आया कि मुझसे ज्यादा शायद भारता माता को मेरे बच्चों की जरूरत है, इसलिए अपना स्वार्थ छोड़ उन्हें देश को समर्पित करने का मन बना लिया। मां हूं, इसलिए दर्द तो होना ही था, लेकिन बच्चों की खुशी और देश की जरूरत की खातिर अपने दर्द को भी पी लिया। बेटी ने ऑल इंडिया स्तर पर हुए चयन में 9 सीटों में अपनी जगह बनाई थी। वहीं बेटे ने बीई करते हुए इंडियन आर्मी में चयनित होने का गौरव प्राप्त किया था। यूनिवर्सिटी एंट्री स्कीम के तहत आर्मी के लिए चयनित होने वाला वह मध्यभारत से इकलौता युवा था। बेटी साक्षी 2015 में इंडियन नेवी में शामिल हुई और अब वह लेफ्टीनेंट कमांडर है, जबकि बेटा सक्षम 2016 में भारतीय सेना का हिस्सा बना और कैप्टन है। हां, जब दोनों बच्चे प्रशिक्षण में थे उस समय उनसे पाबंदियों और नियमों के कारण एक-एक माह बात नहीं हो पाती थी, तब मन जरूर घबराता था, लेकिन अब देश के लिए अपने दोनों बाजू समर्पित कर देने की खुशी दिल को रोमांचित करती है। मेरे लिए वह बड़े गर्व का दिन था जब पासिंग परेड के दौरान बेटी और बेटे की यूनीफार्म पर सेना के प्रतीक लगाए थे। उस दिन मेरा दुख, दर्द सब गायब सा हो गया था, मुझे लग रहा था कि मैं कितनी खुशनसीब मां हूं कि अपने बेटे-बेटी दोनों को देश के लिए समर्पित कर दिया। लेकिन बेटे की पासिंग परेड के 5 माह बाद ही मुझ पर जैसे दुख का पहाड़ टूट पड़ा, मेरे पति रावेंद्र पांडेय के निधन से मेरा जीवन एकाकी हो गया। बेटे-बेटी पहले ही सेना में जा चुके थे, अब पति ने भी साथ छोड़ दिया। उस समय टूटन महसूस हुई, लेकिन बच्चों को महसूस नहीं होने दिया और उनके कॅरियर में बाधा न आए इसलिए खुद को संभालते हुए फिर चल पड़ी। शासकीय हायरसेकंडरी स्कूल में प्राचार्य हूं और अब अधिकांश समय अपनी शासकीय सेवा में ही लगाती हूुं। बच्चों से रोजाना नियमित बात होती है।अब वाकई जीवन एकाकी है, लेकिन मुझे खुशी है कि मेरी पहचान मेरे बच्चों से है। मेरा हर मां से यही कहना है कि बच्चों को पंख दिए हैं तो उन्हें आकाश में उड़ने का मौका भी दें, उनकी राह में बाधा न डालें, यकीनन ये बच्चे आपको गर्व की अनुभूति ही कराएंगे। सच कहूं आज मेरी पहचान जब साक्षी और सक्षम की मां के रूप में होती है तो अपने आप पर गर्व होने लगता है। इससे ज्यादा खुशी और क्या चाहिए।
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जैसा साधना पांडेय, प्राचार्य शासकीय उमावि सौठिंया, विदिशा ने पत्रिका को बताया।
Published on:
07 May 2022 09:49 pm
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