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सदियों बाद अब नटराज के खड़ेे होने की उम्मीद जागी

पुरातत्व विभाग ने प्रतिमा के चारों ओर खुदाई कराकर शिला की मोटाई नापी

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सदियों बाद अब नटराज के खड़ेे होने की उम्मीद जागी

सदियों बाद अब नटराज के खड़ेे होने की उम्मीद जागी

गोविन्द सक्सेना, विदिशा.
विदिशा जिले के उदयपुर ग्राम में पहाड़ी पर दसवीं शताब्दी की विशाल नटराज प्रतिमा सदियों से लेटी हुई पड़ी है। सदियों बाद ही सही लेकिन अब विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमाओं में से एक इस नटराज की प्रतिमा को खड़ी करने की उम्मीद जागी है। पुरातत्व विभाग ने इस ओर ध्यान देकर इसके आसपास की ख्ुादाई कराकर चट्टान पर बनी इस प्रतिमा की मोटाई और वजन का लगभग अनुमान लगाया है, जिससे क्रेन की सहायता से इसे उठाने का प्रयास हो सके। यदि यह खड़ी की जा सकी तो कई मील दूर से पहाड़ी पर इस अद्भुत प्रतिमा के दर्शन हो सकेंगे, अन्यथा अभी तो यहां पर्यटकों का पहुंचना भी आसान नहीं है।

उदयपुर के प्रसिद्ध नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर से करीब डेढ़ किमी दूर पहाड़ी की तलहटी में मौजूद यह विशालकाय प्रतिमा करीब 27 फीट लंबी, 16 फीट चौड़ी और 5 फीट से ज्यादा मौटी है। प्रतिमा छह भुजीय है, जिसमें नटराज का जटामुकुट और चेहरा ही करीब 6 फीट का है। वे नृत्य मुद्रा में हैं और उनके पैरों तले एक दैत्य दबा हुआ है। गले में नागमाला, हाथ में दंड, त्रिशूल, डमरू और षटखंड सहित अभयम़ुद्रा दिखाई देती है। कई वर्ष से इसकी पहचान ठीक से न होने और विशालकाय प्रतिमा होने के कारण लोग इसे रावणटोल के नाम से जानते हैं। नटराज की प्रतिमा राज्य पुरातत्व के अधीन है।

पहले यह माना जा रहा था कि पहाड़ की ही किसी विशाल शिला पर इसे उकेरा गया होगा, लेकिन इस शिला की मोटाई और लगभग वजन जानने के लिए जब राज्य पुरातत्व विभाग ने इसके आसपास के हिस्से की खुदाई कराई तो यह शिला कहीं और से लाई गई प्रतीत हुई, जिसकी मोटाई करीब 5 फीट है। इसकी लंबाई 27 फीट और चौड़ाई 16 फीट से ज्यादा है। अनुमानत: यह प्रतिमा करीब डेढ़ से दो सौ टन की प्रतीत होती है। खुदाई के बाद जब शिला के पहाड़ी पर अलग से रखे जाने का खुलासा हुआ तो पुरातत्व विभाग को भी कुछ बेहतर करने की उम्मीद जागी है। दरअसल अब विभाग इस ओर सोचने लगा है कि इस प्रतिमा को किसी तरह खड़ा किया जा सकता है, हालांकि यह काम मुश्किल है, लेकिन के्रन आदि की मदद से यह संभव है। इससे पहले भारतीय संस्कृति निधि(इंटेक)ने भी जब उदयपुर का सर्वे किया तो नटराज को विलक्षण और भारत की सबसे बड़ी प्रतिमाओं में से एक मानकर इस पर आश्चर्य जताया था कि यह इतना विशाल पत्थर यहां लाया कैसे गया होगा? अब जब शिला का आकार, वजन सामने आ गया है तो इसे खड़ा करने की दिशा में प्रयाश शुरू किए गए हैं। प्रतिमा की तली तक खुदाई हो गई है, जिससे इसकी वास्तविक मोटाई और उठाने के लिए अपनाई जाने वाली तकनीक पर विचार हो रहा है। उधर इंटेक के राज्य कन्वीनर डॉ एमएम उपाध्याय का कहना है कि यदि यह प्रतिमा इस पहाड़ी पर खड़ी की जा सके तो दूर तक इसे देखा जा सकेगा।
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पहाड़ी पर ही स्थापित करने की थी योजना
उदयपुर परमार राजा उदयादित्य द्वारा बसाई नगरी है, उन्हीं ने यहां विख्यात उदयेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना कराई थी, जो अब नीलकंठेश्वर के नाम से जाने जाते हैं। उसी समय पहाड़ी पर नटराज की यह प्रतिमा उकेरी गई। शायद इसी पहाड़ी पर नटराज को एक विशाल चबूतरे पर स्थापित करने की मंशा रही होगी। प्रमाण के तौर पर नटराज की प्रतिमा के पास ही तीन-चार पत्थर के गोल स्तंभ और सात पैडस्टल भी मिले हैं, जिन पर प्रतिमा रखी जाने का विचार होगा, लेकिन किन्हीं कारणो से यह संभव नहीं हो सका और बनने के बाद से नटराज उठ न सके।

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पुरातत्व विभाग ने नटराज की प्रतिमा के आसपास खुदाई कराकर शिला की मोटाई जानने का प्रयास किया है। यह बात सामने आई है कि प्रतिमा खड़ी की जा सकती है। यह प्रतिमा उठने लायक है, लेकिन क्रेन लगाना पड़ेगी, काम मुश्किल है, लेकिन असंभव नहीं। बहुत सतर्कता से यह काम करना होगा, इसके बाद जब यह खड़ी होगी तो मीलों दूर से दिखाई देने लगेगी।
-प्रकाश परांजपे, उपसंचालक राज्य पुरातत्व विभाग भोपाल