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भगवान परशुराम की सबसे प्राचीन प्रतिमा

दसवीं शताब्दी में बना था यह मंदिर

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 Lord Parashurama

दसवीं शताब्दी में बना था यह मंदिर

विदिशा. भगवान विष्णु के छठवें अवतार भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव मंगलवार को उत्साह से मनाया जा रहा है। यूं तो परशुराम जी की प्रतिमाएं अनेक स्थानों पर मिलती हैं, लेकिन VIDISHA जिले की Oldest परशुराम प्रतिमा ग्यारसपुर के हिंडोला तोरण द्वार पर िस्थत है। यहां परशुराम जी के साथ ही भगवान विष्णु के सभी दस अवतारों के दर्शन होते हैं। यहां भगवान परशुराम हाथ में परशु यानी फर्सा लिए दिखाई देेते हैं। यह मंदिर करीब दसवीं शताब्दी में बना था, जिसके अवशेषों के रूप में यहां हिंडोला तोरणद्वार, चार खंबों का मंडप और सबसे महत्वपूर्ण दशावतार की प्रतिमाएं ही यहां बचीं हैं। बाकी पूरा परिसर उत्खनन से प्राप्त मंदिर और प्रतिमाओं के खंडित टुकड़ों से भरा पड़ा है। विदिशा जिले के ग्यारसपुर नगर में भगवान विष्णु के भव्य और विशाल मंदिर के अब अवशेष ही बचे हैं। प्रतीक के तौर पर यहां अब सबसे महत्वपूर्ण हिंडोला तोरण द्वार है, यह तोरण द्वार मंदिर का प्रवेश द्वार रहा होगा, जिसकी आकृति झूले जैसी होने के कारण इसे हिंडोला नाम दिया गया। यह ऐसा सबसे बड़ा प्रमाण है जिससे यह साबित होता है कि अतीत में यहां भव्य और विशाल विष्णु मंदिर रहा होगा। इस तोरणद्वार पर दो जगह विष्णु के दसावतार की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। हिंडोला तोरणद्वार के दो स्तंभ हैं और दोनों स्तंभों पर दसावतार की प्रतिमाएं हैं। एक स्तंभ पर पांच प्रतिमाएं हैं, इनमें से तीन दिशाओं में एक-एक और शेष एक दिशा में दो प्रतिमाएं मौजूद हैं। इस तरह दोनों स्तंभों को मिलाकर यहां भगवान विष्णु के दस अवतारों को उत्कीर्ण किया गया है। एक स्तंभ पर मत्स्य अवतार, कच्छप, वराह, नृसिंह और वामन अवतार की प्रतिमाएं हैं। तो दूसरे स्तंभ पर भगवान परशुराम, श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतार की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। इसी तरह की प्रतिमाएं तोरणद्वार के शिखर पर भी यही दसावतार विराजमान हैं। इसके साथ ही प्रवेश द्वार पर मंगल के प्रतीक गणेशजी की प्रतिमा मौजूद है।

गौरतलब है कि हिंडोला तोरण द्वार के इसी परिसर में विश्वप्रसिद्ध शाल भंजिका की प्रतिमा मिली थी। शालभंजिका की तरह की ही कई प्रतिमाएं यहां हिंडोला द्वार के पीछे िस्थत चार खंबों वाले मंडप के शहतीरों पर दिखाई देती हैं। यहां कई प्रतिमाएं खजराुहों की प्रतिमाओं से मेल खाती हैं। चौतरफा खंबों पर भारवाहक यक्षों की प्रतिमाएं चारों दिशाओं में मंदिर, शहतीरों और अन्य संरचनाओं का भार सहन करती दिखाई देती हैं। कमल रूपी आकृति की बेलों के साथ ही में यहां प्रतिमाएं विराजमान हैं। लेकिन जिस तरह से यहां दसावतारों के दर्शन अब भी पूरी तरह स्पष्ट रूप में दिखाई देते हैं वह दुर्लभ है।