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शहर में ढूंढे से नहीं मिलते कौवे, काग उद्यान में लगा रहता है जमघट

मुक्तिधाम पर बेतवा तट के पास बनाए गए काग उद्यान में अब कौवों का डेरा लग गया है...

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विदिशा. काग उद्यान की रैलिंग पर बैठे कौवे।

विदिशा. शहर से जैसे कौवे गायब से हो गए हैं। पहले जहां घरों, छतों और पेड़ों पर कौवों की कांव-कांव अक्सर सुनाई देती थी, वह लुप्त हो गई है। यहां तक कि लोगों को जब अपने पुरखों की याद में तर्पण कर कौवों को भोजन देना हो तो भी एक कौवा तक तलाशना मुश्किल हो जाता है। लेकिन सुखद संकेत है कि मुक्तिधाम पर बेतवा तट के पास बनाए गए काग उद्यान में अब कौवों का डेरा लग गया है।

मुक्तिधाम समिति और बेतवा उत्थान समिति के संयुक्त प्रयासों से यहां कौवों की चहल-पहल खूब दिखाई देने लगी है। नदी किनारे काग उद्यान बनाने की परिकल्पना भी यही थी। श्रमदानियों द्वारा यहां रोजाना कौवों के लिए पानी और भोजन की व्यवस्था की जाती है। होटलों से बासा बचने वाला नाश्ता और अपने-अपने घरों से रोटी-ब्रेड आदि लाकर यहां कौवों के लिए डालना श्रमदानियों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है।

यही कारण है कि यहां कौवों का डेरा लगा रहता है। दिन भर कौवों की कांव-कांव से यह उद्यान अब रौनक भरा रहने लगा है। जब शहर से ये पक्षी पूरी तरह लुप्त हो गए हैं, तब नदी किनारे शहर के ही चंद लोगों के प्रयास से इन पक्षियों का फिर से जमघट लगना मन को सुकून देने वाला है। खासकर पितृपक्ष में जब लोगों को अपने पितरों के नाम पर भोजन देने के लिए कौवों की तलाश में भटकना पड़ता था, तब यहां कौवों को भोजन कराने लोग आने लगे थे, लेकिन अब यहां कौवों की संख्या दिन ब दिन खूब बढऩे लगी है।

उनके अनुकूल वातावरण और भोजन, पानी छांव की व्यवस्था से यहां कौवों का कुनबा बढ़ रहा है। श्रमदानियों का कहना है कि यदि शहर के कुछ अन्य पार्कों में भी इसी तरह के प्रयास हों तो वहां भी कौवों, गौरैया सहित कई पक्षियों के कुनबे को बढ़ाने और शहर से बाहर हो गए पक्षियों को फिर शहर में लाने का प्रयास सार्थक हो सकता है। लेकिन वहां भी ऐसे ही सार्थक प्रयास और साधन उपलब्ध कराना आवश्यक होगा, तभी यह प्रयोग सफल हो सकेगा।

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